युवाओं को दे रही नई उड़ान, 20 सालों से कई युवाओं को पहुंचाया मंजिल तक

दो दशक से शिक्षा के क्षेत्र में जुटीं प्रियंका सिंह ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को बनाया युवाओं के भविष्य निर्माण का माध्यम, बेटियों की बढ़ती भागीदारी को मानती हैं सामाजिक बदलाव की बड़ी तस्वीर

हिम्मत ही आपकी सबसे बड़ी पहचान बनती है, लेकिन सोचने और देखने का नजरिया हमेशा सकारात्मक होना चाहिए।

रायपुर। किसी भी समाज के भविष्य की तस्वीर उसकी युवा पीढ़ी से तय होती है और युवाओं के भविष्य की मजबूत नींव शिक्षा से बनती है। इसी सोच को अपने जीवन का उद्देश्य बनाकर रायपुर की प्रियंका सिंह पिछले करीब दो दशक से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही हैं। उन्होंने उस समय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के क्षेत्र में कदम रखा, जब इस क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी बेहद सीमित थी। शुरुआत महज 15-20 विद्यार्थियों से हुई थी। संसाधन सीमित थे, लेकिन लक्ष्य बड़ा था—युवाओं को सही दिशा देना और उन्हें अपने सपनों तक पहुंचने के लिए बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना।

आज करीब 20 वर्ष बाद उनके संस्थान में लगभग 500 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। इन वर्षों में प्रियंका ने केवल एक शिक्षण संस्थान का विस्तार नहीं किया, बल्कि सैकड़ों युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करने के साथ उनमें आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच और लक्ष्य के प्रति गंभीरता पैदा करने का प्रयास किया। उनके लिए शिक्षा किसी परीक्षा में अच्छे अंक हासिल करने तक सीमित नहीं है। वह इसे व्यक्ति की सोच, दृष्टिकोण और व्यक्तित्व को बदलने का माध्यम मानती हैं।

यही वजह है कि प्रियंका की कहानी केवल एक महिला के संघर्ष और सफलता की कहानी नहीं, बल्कि शिक्षा के जरिए समाज में आ रहे बदलाव की कहानी भी है।

जब शुरुआत हुई, तब लड़कियों की संख्या थी बेहद कम

करीब दो दशक पहले जब प्रियंका सिंह ने क्लैट और कैट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने का काम शुरू किया, तब इन परीक्षाओं को लेकर विद्यार्थियों और अभिभावकों के बीच आज जैसी जागरूकता नहीं थी। खासतौर पर छात्राओं की भागीदारी काफी कम थी। उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए दूसरे शहरों में जाकर पढ़ाई करने को लेकर भी कई परिवारों में संकोच रहता था।

प्रियंका ने इसी माहौल में अपनी शुरुआत की। उनके सामने एक तरफ संस्थान को स्थापित करने की चुनौती थी तो दूसरी तरफ विद्यार्थियों का विश्वास हासिल करने की जिम्मेदारी। शुरुआत में केवल 15 से 20 विद्यार्थी उनके साथ जुड़े। संख्या छोटी थी, लेकिन इसी छोटे समूह के साथ उन्होंने अपने शिक्षण सफर की नींव रखी।

उन्होंने विद्यार्थियों की जरूरत को समझने और उनकी तैयारी को बेहतर बनाने पर लगातार काम किया। धीरे-धीरे विद्यार्थियों और अभिभावकों का भरोसा बढ़ा। एक बैच से दूसरे बैच तक यह भरोसा आगे बढ़ता गया और वर्षों में यह प्रयास एक बड़े शिक्षण संस्थान के रूप में विकसित होता गया।

आज करीब 500 विद्यार्थी उनके संस्थान में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

प्रियंका सिंह के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने का काम नहीं है। उनका मानना है कि विद्यार्थी को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि परीक्षा में क्या पढ़ना है। उसे यह भी समझना जरूरी है कि वह क्यों पढ़ रहा है, उसका लक्ष्य क्या है और उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उसे किस तरह की तैयारी करनी चाहिए।

इसी सोच के कारण उनके शिक्षण कार्य में पढ़ाई के साथ विद्यार्थियों की सोच और व्यक्तित्व को मजबूत करने पर भी जोर रहता है। वह मानती हैं कि कई बार विद्यार्थी के पास प्रतिभा होती है, लेकिन आत्मविश्वास की कमी उसके रास्ते में बाधा बन जाती है। ऐसे में शिक्षक की भूमिका केवल विषय पढ़ाने वाले व्यक्ति की नहीं, बल्कि मार्गदर्शक की भी होती है।

प्रियंका कहती हैं कि शिक्षा कभी व्यर्थ नहीं जाती। किसी विद्यार्थी को मिली शिक्षा तत्काल नौकरी या सफलता के रूप में दिखाई दे या नहीं, लेकिन वह उसकी सोच और जीवन को प्रभावित करती है। पढ़ाई व्यक्ति को परिस्थितियों को समझने, सही निर्णय लेने और अपने भविष्य के लिए बेहतर विकल्प चुनने की क्षमता देती है।

20 साल में बदली विद्यार्थियों की सोच

प्रियंका के दो दशक के सफर में केवल उनका संस्थान ही नहीं बदला, बल्कि विद्यार्थियों और समाज की सोच में भी बड़ा बदलाव आया है। वह बताती हैं कि पहले प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर विद्यार्थियों में जानकारी सीमित थी। अब युवा पहले से अधिक जागरूक हैं। वे अपने करियर को लेकर गंभीर हैं और बेहतर संस्थानों में प्रवेश पाने के लिए योजनाबद्ध तैयारी कर रहे हैं।

इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों ने भी विद्यार्थियों के सामने अवसरों की दुनिया खोल दी है। अब छोटे शहरों और सामान्य परिवारों से आने वाले विद्यार्थी भी देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश का सपना देख रहे हैं।
प्रियंका के अनुसार, यह बदलाव शिक्षा के विस्तार का परिणाम है। आज युवा केवल पारंपरिक करियर विकल्पों तक सीमित नहीं रहना चाहते। वे कानून, प्रबंधन और दूसरे प्रोफेशनल क्षेत्रों में भी आगे बढ़ना चाहते हैं।

बेटियों की शिक्षा ने बदली तस्वीर

प्रियंका सिंह के शिक्षा सफर का एक महत्वपूर्ण पहलू छात्राओं की बढ़ती भागीदारी है। वह बताती हैं कि जब उन्होंने शुरुआत की थी, तब क्लैट और कैट जैसी परीक्षाओं की तैयारी करने वाली लड़कियों की संख्या कम होती थी। परिवारों में भी बेटियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने को लेकर उतना उत्साह नहीं था।

लेकिन पिछले वर्षों में तस्वीर पूरी तरह बदली है।

आज बड़ी संख्या में छात्राएं इन परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं। कई बार तो कक्षाओं और परीक्षाओं में छात्राओं की संख्या लड़कों से भी अधिक दिखाई देती है। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव अभिभावकों की सोच में आया है। अब वे बेटियों की उच्च शिक्षा को खर्च नहीं, बल्कि उनके भविष्य में निवेश के रूप में देखने लगे हैं।

प्रियंका इसे समाज के लिए सकारात्मक संकेत मानती हैं।

उनके अनुसार, जब परिवार बेटियों को पढ़ने और अपने करियर का चुनाव करने की स्वतंत्रता देते हैं, तो उसका असर केवल उस एक लड़की तक सीमित नहीं रहता। शिक्षित और आत्मनिर्भर महिला आगे चलकर परिवार के निर्णयों में भागीदारी करती है और अगली पीढ़ी की शिक्षा को भी प्राथमिकता देती है।

महिला होकर पुरुष वर्चस्व वाले क्षेत्र में बनाई जगह

प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग का क्षेत्र लंबे समय तक पुरुषों के वर्चस्व वाला माना जाता रहा है। ऐसे क्षेत्र में महिला के लिए संस्थान शुरू करना और उसे वर्षों तक सफलतापूर्वक संचालित करना अपने आप में चुनौती थी।

प्रियंका ने इस चुनौती को अपनी पहचान बनने नहीं दिया। उन्होंने अपनी कार्यक्षमता, मेहनत और विद्यार्थियों के साथ निरंतर जुड़ाव को अपनी ताकत बनाया। शुरुआत में उन्हें अपने काम को साबित करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ी, लेकिन समय के साथ उनके काम ने ही उनकी पहचान बनाई।

आज वह अकेली महिला के रूप में एक शिक्षण संस्थान का सफल संचालन कर रही हैं। उनके सामने अब सबसे बड़ी चुनौती संस्थान को बड़ा करना भर नहीं है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता को बनाए रखना और विद्यार्थियों के बदलते जरूरतों के अनुरूप खुद को लगातार अपडेट करते रहना है।

हर विद्यार्थी को मानती हैं एक संभावना

प्रियंका के लिए किसी विद्यार्थी की क्षमता केवल उसके वर्तमान प्रदर्शन से तय नहीं होती। उनका मानना है कि हर विद्यार्थी के भीतर आगे बढ़ने की संभावना होती है। जरूरत है तो केवल सही दिशा, उचित मार्गदर्शन और लगातार प्रयास की।

कई बार सामान्य परिवारों से आने वाले विद्यार्थी संसाधनों की कमी के कारण खुद को दूसरों से कमतर समझने लगते हैं। प्रियंका ऐसे विद्यार्थियों में आत्मविश्वास पैदा करने को भी शिक्षा का हिस्सा मानती हैं।

उनका कहना है कि प्रतियोगी परीक्षा में सफलता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती। इसके लिए अनुशासन, निरंतर अभ्यास, समय का सही उपयोग और असफलता के बाद दोबारा खड़े होने का साहस भी जरूरी है।

यही कारण है कि वह विद्यार्थियों को केवल परीक्षा की तैयारी नहीं करातीं, बल्कि उन्हें असफलता को स्वीकार कर उससे सीखने के लिए भी प्रेरित करती हैं।

सफलता का रास्ता सकारात्मक सोच से

प्रियंका सिंह के जीवन और काम की सबसे बड़ी सीख उनकी सकारात्मक सोच है। उनका मानना है कि परिस्थितियां हमेशा व्यक्ति के पक्ष में नहीं होतीं। कई बार संसाधनों की कमी होती है, कई बार रास्ता कठिन होता है और कई बार मेहनत के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता। लेकिन ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति का नजरिया ही उसे आगे बढ़ाता है।

उनके अनुसार, हिम्मत व्यक्ति की पहचान बनाती है और सकारात्मक सोच उसे आगे बढ़ने की ताकत देती है। **

इसी सोच ने उन्हें दो दशक तक शिक्षा के क्षेत्र में लगातार काम करने की ऊर्जा दी। शुरुआत में जहां केवल कुछ विद्यार्थी उनके साथ थे, वहीं आज सैकड़ों युवा उनके संस्थान का हिस्सा हैं।

शिक्षा के जरिए समाज में बदलाव की कोशिश

प्रियंका की यात्रा को केवल एक शिक्षण संस्थान की सफलता के आंकड़ों से नहीं देखा जा सकता। 15-20 विद्यार्थियों से शुरू होकर करीब 500 विद्यार्थियों तक पहुंचना उनके काम का एक पहलू है, लेकिन इससे बड़ा पक्ष यह है कि उन्होंने शिक्षा को युवाओं के भविष्य से जोड़कर देखा। उनके लिए एक विद्यार्थी की सफलता के पीछे उसके परिवार की उम्मीदें होती हैं। जब वह विद्यार्थी आगे बढ़ता है तो उसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। यही सोच प्रियंका को अपने काम के प्रति जिम्मेदार बनाए रखती है।

दो दशक के इस सफर में उन्होंने यह समझा है कि शिक्षा का असर धीरे-धीरे दिखाई देता है, लेकिन जब दिखाई देता है तो लंबे समय तक रहता है। एक पीढ़ी शिक्षित होती है तो अगली पीढ़ी के लिए रास्ते और अवसर और बेहतर हो जाते हैं।

अब लक्ष्य शिक्षा की गुणवत्ता को और मजबूत करना

प्रियंका सिंह का शिक्षा सफर अभी थमा नहीं है। उनका मानना है कि बदलते समय के साथ शिक्षा का तरीका भी बदलना जरूरी है। प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रकृति बदल रही है, विद्यार्थियों की जरूरतें बदल रही हैं और तकनीक शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।

ऐसे में शिक्षकों और शिक्षण संस्थानों के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि वे समय के साथ खुद को बदलें, लेकिन शिक्षा के मूल उद्देश्य को न भूलें।

प्रियंका की नजर में शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल नौकरी हासिल करना नहीं, बल्किऐसे युवा तैयार करना है जो अपने फैसले खुद ले सकें, चुनौतियों का सामना कर सकें और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझें।

15 विद्यार्थियों से शुरू हुई उनकी यात्रा आज करीब 500 युवाओं तक पहुंच चुकी है। यह आंकड़ा उनके संस्थान के विस्तार को जरूर बताता है, लेकिन इससे कहीं अधिक यह उस विश्वास की कहानी कहता है, जो दो दशकों में विद्यार्थियों और अभिभावकों के बीच बना है।

प्रियंका सिंह की कहानी इस बात की मिसाल है कि यदि उद्देश्य स्पष्ट हो, हिम्मत बनी रहे और सोच सकारात्मक हो, तो सीमित संसाधनों से शुरू किया गया छोटा प्रयास भी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को रोशन करने वाला बड़ा अभियान बन सकता है।
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