मजदूरी करने वाली गनेशी बनीं 200 बकरियों की मालकिन, अब दूसरों को सिखा रहीं आत्मनिर्भरता का हुनर
कभी पति के साथ दूसरों के खेत-घर में करती थीं मजदूरी, बकरी पालन को बनाया कारोबार; बढ़ी आमदनी तो खरीदा ट्रैक्टर और बढ़ाई जमीन, अब गांव की महिलाओं को दे रहीं प्रशिक्षण

कोंडागांव? कोंडागांव जिले के बड़ेराजपुर विकासखंड के छोटे से गांव बस्तरबुड्रा की गनेशी मरकाम की कहानी संघर्ष से आत्मनिर्भरता तक पहुंचने की ऐसी मिसाल है, जिसने न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बदली, बल्कि गांव में उनकी पहचान भी बदल दी। करीब दस साल पहले जब गनेशी विवाह के बाद ससुराल आई थीं, तब परिवार के पास खेती की जमीन कम थी। आमदनी का कोई स्थायी जरिया नहीं था। ऐसे में उन्हें पति के साथ दूसरे लोगों के घर और खेतों में मजदूरी करने जाना पड़ता था। दिनभर मेहनत के बाद इतनी ही कमाई हो पाती थी कि परिवार का गुजर-बसर हो सके।
इसी बीच परिवार ने कुछ बकरियां पाल रखी थीं। गांव और आसपास चारे की पर्याप्त उपलब्धता ने गनेशी को एक नया रास्ता दिखाया। उन्होंने सोचा कि जिस काम को परिवार छोटे स्तर पर कर रहा है, उसे व्यवस्थित तरीके से व्यवसाय बनाया जाए। यहीं से उनकी जिंदगी बदलने की शुरुआत हुई। गनेशी बिहान महिला स्व-सहायता समूह से जुड़ीं और बकरी पालन को कारोबार के रूप में आगे बढ़ाने का फैसला किया।
10-15 बकरियों से शुरू किया सफर, अब 200 से ज्यादा
शुरुआत में परिवार के पास महज 10 से 15 बकरियां थीं। गनेशी ने इन्हीं से अपना कारोबार खड़ा किया। बकरियों की देखभाल, उनके खान-पान, स्वास्थ्य और प्रजनन पर ध्यान देने के साथ उन्होंने धीरे-धीरे संख्या बढ़ाई। मेहनत रंग लाई और कुछ ही वर्षों में उनका छोटा-सा पशुपालन व्यवसाय बड़े कारोबार में बदल गया।
आज गनेशी के पास 200 से ज्यादा बकरियां हैं। बकरी पालन से होने वाली आमदनी ने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है। कभी मजदूरी करने वाला परिवार अब अपने व्यवसाय के लिए दूसरे लोगों को रोजगार दे रहा है।
गनेशी कहती हैं,जब मैं शादी करके यहां आई थी, तब घर की हालत अच्छी नहीं थी। मजदूरी करके परिवार का खर्च चलाना मुश्किल था। बकरियां पहले भी थीं, लेकिन मैंने इन्हें व्यवसाय के रूप में देखा। मेहनत और परिवार के सहयोग से आज यही बकरियां हमारी पहचान बन गई हैं।
आमदनी बढ़ी तो जमीन और ट्रैक्टर भी खरीदा
बकरी पालन से आमदनी बढ़ने के बाद परिवार ने अपनी जरूरतें पूरी करने के साथ भविष्य के लिए भी निवेश करना शुरू किया। गनेशी ने खेती की जमीन बढ़ाई और परिवार ने ट्रैक्टर भी खरीदा। आर्थिक स्थिति मजबूत होने के साथ घर के रहन-सहन में बदलाव आया।
जिस परिवार के सदस्य कभी दूसरों के यहां मजदूरी करने जाते थे, आज उसी परिवार ने अपने बकरी पालन व्यवसाय में काम करने के लिए मजदूर रखे हैं। गांव में भी अब लोग गनेशी के व्यवसाय को देखने और उससे जुड़ी जानकारी लेने पहुंचते हैं।
खुद सीखा, अब दूसरों को सिखा रहीं
गनेशी की सफलता की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने अपनी तरक्की को सिर्फ अपने परिवार तक सीमित नहीं रखा। बकरी पालन में अनुभव हासिल करने के बाद अब वह ट्रेनर के रूप में दूसरी महिलाओं और ग्रामीण परिवारों को बकरी पालन की जानकारी दे रही हैं।
वह महिलाओं को बताती हैं कि कम जमीन और सीमित संसाधनों के बावजूद पशुपालन को आय के स्थायी साधन के रूप में अपनाया जा सकता है। बकरियों के लिए उपलब्ध स्थानीय चारे का इस्तेमाल, साफ-सफाई, खान-पान, बीमारियों से बचाव, नस्ल सुधार और बाजार में बिक्री जैसे विषयों पर वह अपने अनुभव साझा करती हैं।
गनेशी के प्रशिक्षण से जुड़ने वाली महिलाओं को सबसे बड़ा भरोसा यह मिलता है कि उन्हें कोई किताबी जानकारी नहीं, बल्कि उसी काम को करके सफल हुई महिला सिखा रही है। यही वजह है कि अब वह गांव और आसपास की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी ह
मजदूर से मालकिन तक बदली पहचान
गनेशी की कहानी केवल बकरी पालन से कमाई बढ़ने की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है, जिसमें एक महिला ने अपनी परिस्थितियों को अपनी कमजोरी मानने के बजाय उन्हें आगे बढ़ने का जरिया बनाया।
एक समय था जब गनेशी को पति के साथ मजदूरी करने जाना पड़ता था। आज वह अपने व्यवसाय की मालकिन हैं और दूसरों को रोजगार देने के साथ महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का रास्ता भी दिखा रही हैं। परिवार और समाज में उनका सम्मान भी बढ़ा है।
वह कहती हैं, कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। जरूरत है उसे लगन और ईमानदारी से करने की। मैंने मजदूरी से शुरुआत की, फिर बकरी पालन को व्यवसाय बनाया। आज जो कुछ है, वह मेहनत से है। अब मेरी कोशिश है कि दूसरी महिलाएं भी अपने पैरों पर खड़ी हों और किसी पर निर्भर न रहें।
गनेशी की सफलता से महिलाओं को मिला नया रास्ता
10-15 बकरियों से शुरू हुआ कारोबार
* अब 200 से ज्यादा बकरियां
* बकरी पालन से परिवार की आय में बढ़ोतरी
* खेती की जमीन बढ़ाई, ट्रैक्टर खरीदा
* व्यवसाय में अब दूसरे लोगों को रोजगार
* बिहान समूह से जुड़कर बढ़ाया आत्मविश्वास
अब ट्रेनर बनकर दूसरी महिलाओं को दे रही प्रशिक्षण
मजदूरी से शुरू हुआ सफर अब उद्यमिता और नेतृत्व तक पहुंच चुका है। गनेशी की कहानी बताती है कि ग्रामीण महिलाओं के हाथ में अगर हुनर, अवसर और सही मार्गदर्शन हो तो वे परिवार की मददगार भर नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक ताकत और गांव की दूसरी महिलाओं की मार्गदर्शक बन सकती हैं।
: जिस गांव में महिलाएं चुप रहती थीं, वहां अब पंचायत में अपने हक की बात करती हैं
सोच :शिक्षा और जागरूकता वह ताकत है, जो सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, पूरे समाज की सोच बदल सकती है।
सरिता दुबे | रायपुर
कभी गांव की महिलाएं घरेलू हिंसा, जेंडर असमानता और अपने अधिकारों को लेकर खुलकर बात नहीं कर पाती थीं। पंचायत में भी उनकी आवाज दब जाती थी। अपने हक की जानकारी नहीं होने के कारण वे कई फैसलों में पीछे रह जाती थीं। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। महिलाएं पंचायतों में अपनी बात रख रही हैं, जमीन में अपना हिस्सा मांग रही हैं और दूसरी महिलाओं को भी उनके अधिकारों के प्रति जागरूक कर रही हैं। इस बदलाव के पीछे सक्ती जिले के डबरा ब्लॉक के बरमेरा क्षेत्र के बरतुग्गा गांव की अनिता घृतलहरे की करीब दो दशक की मेहनत है।
साल 2006 से लोगों के बीच काम कर रहीं अनिता ने महिलाओं और वंचित समुदाय के बीच जागरूकता को अपने काम का केंद्र बनाया। बचपन से ही उनके मन में एक सवाल था—जब भगवान ने इंसानों में भेदभाव नहीं किया तो इंसान ही इंसानों के बीच भेदभाव क्यों करे? इसी सोच के साथ उन्होंने अपने समाज के लोगों को शिक्षा और अधिकारों के प्रति जागरूक करने के साथ महिलाओं को जेंडर असमानता, घरेलू हिंसा और महिलाओं पर होने वाली रोकटोक के खिलाफ आवाज उठाने के लिए तैयार किया।
एक महिला से शुरू हुआ अभियान, हजारों तक पहुंचा
अनिता ने जागरूकता के लिए महिला समूहों को माध्यम बनाया। कई गांवों में उन्होंने एक हजार से अधिक महिला समूहों की हजारों महिलाओं को जोड़ा। इन समूहों की महिलाओं को बारी-बारी से घरेलू हिंसा और जेंडर असमानता जैसे मुद्दों पर जागरूक किया गया। इसके बाद सखीमन के जरिए महिलाओं के बीच मजबूत कड़ी तैयार की गई, जिससे एक गांव में जागरूक हुई महिला दूसरे गांव की महिलाओं तक भी अपनी बात पहुंचाने लगी।
इस प्रयास ने जागरूकता को किसी एक गांव या एक महिला तक सीमित नहीं रहने दिया। धीरे-धीरे महिलाओं के बीच अपने अधिकारों को लेकर समझ बढ़ी और उन्होंने अपनी बात खुद रखने की शुरुआत की।
अब पंचायत में महिलाएं पूछती हैं अपने अधिकार
अनिता के काम का सबसे बड़ा असर पंचायतों में दिखाई देने लगा है। उन्होंने जागरूकता के लिए जेंडर फोरम बनाया। इसी मंच के जरिए महिलाओं तक उनके अधिकारों और सामाजिक असमानता से जुड़े मुद्दों की जानकारी पहुंचाई जाती है।
अब महिलाएं पंचायतों में केवल सुनने वाली नहीं, बल्कि अपनी बात रखने वाली बन रही हैं। जमीन के मामलों में भी महिलाएं अपने अधिकार और हिस्से की मांग कर रही हैं।
कुछ महीने पहले बरतुग्गा गांव में हुई पंचायत का उदाहरण देते हुए अनिता बताती हैं कि एक महिला ने अपने पति से साफ कहा कि वह उसके साथ नहीं रहना चाहती और अपने गुजारे के लिए जमीन में अपना हिस्सा चाहती है।
यह घटना केवल जमीन के हिस्से की मांग नहीं थी। यह उस सोच में बदलाव का संकेत थी, जिसमें महिला अपने जीवन और भविष्य से जुड़े फैसले खुद लेने के लिए अपनी आवाज उठा रही थी।
पलायन करने वाले अब छिपते नहीं, जानकारी देने लगे
अनिता के काम का असर सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं रहा। वह बताती हैं कि पहले क्षेत्र से पलायन करने वाले लोग बिना बताए चुपचाप दूसरे स्थानों पर चले जाते थे। अब स्थिति बदली है। लोग पलायन की जानकारी देने लगे हैं।
अनिता इसे जागरूकता के अपने काम का परिणाम मानती हैं। उनके अनुसार लोगों को जब अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों की जानकारी हुई तो उन्होंने भी अपनी स्थिति को समझना शुरू किया।
बदलाव की शुरुआत घर से, असर पूरे गांव पर
अनिता का मानना है कि जेंडर समानता केवल महिलाओं को अधिकार देने का मुद्दा नहीं है, बल्कि समाज की सोच बदलने का विषय है। उनका संदेश है कि लड़के और लड़की में कभी भेदभाव नहीं होना चाहिए। शिक्षा को वह इस बदलाव का सबसे बड़ा हथियार मानती हैं।
उनका कहना है कि जब समाज शिक्षित होगा तो महिलाओं को समानता का दर्जा मिलने के साथ उन्हें अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता भी मिलेगी।
अनिता के काम से आया बदलाव
2006 से शुरुआत — लोगों के बीच जागरूकता का काम
हजारों महिलाएं जुड़ीं— महिला समूहों के जरिए जागरूकता अभियान
जेंडर फोरम बना— महिलाओं को अधिकारों की जानकारी देने का मंच
पंचायत में बदली भूमिका — अब महिलाएं खुलकर अपनी बात रख रही हैं
जमीन के अधिकार की आवाज — महिलाएं अपने हिस्से की मांग करने लगीं
पलायन पर बदलाव — अब बाहर जाने वाले लोग जानकारी देने लगे हैं
एक महिला, जिसने बदल दी गांव की आवाज
अनिता की कहानी किसी सरकारी योजना की सफलता की कहानी भर नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है, जो तब आता है जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक लोगों के बीच रहकर उनकी सोच बदलने की कोशिश करता है। बरतुग्गा से शुरू हुई उनकी पहल ने महिलाओं को यह भरोसा दिया कि पंचायत में उनकी भी आवाज है, परिवार में उनके भी अधिकार हैं और अपने जीवन का फैसला लेने का उन्हें भी हक है।
आज अनिता अकेली आवाज नहीं हैं। उनके साथ खड़ी हजारों जागरूक महिलाएं उस बदलाव की नई आवाज बन चुकी हैं, जिसकी शुरुआत करीब दो दशक पहले एक गांव की महिला ने की थी।











