World TB Day 2025: कोरोना से कमजोर फेफड़ों को एडवांस दवाओं से नया जीवन

कोरोनाकाल ने लोगों के फेफड़े को कमजोर किया है, लेकिन एडवांस दवाओं से इलाज आसान हुआ है। 20 साल पहले जहां टीबी से 100 में 40 से 50 मरीजों की मौत हो जाती थी। अब इसकी संख्या घटकर महज 3 रह गई है। यानी एडवांस दवा व इलाज से टीबी के मरीजों का जीवन बढ़ गया है। यही नहीं मेडिकल कॉलेज समेत जिला अस्पतालों व सीएचसी में टीबी जांच से मरीजों की पहचान भी जल्दी होने लगी है।
नियमित दवाओं के सेवन से मरीज तय समय में भी ठीक हो रहे हैं। अच्छी बात ये है कि सरकारी अस्पतालों में अब केंद्र सरकार से नियमित दवाओं की सप्लाई होने से मरीजों को पूरा डोज मिल रहा है। पिछले साल दवाएं सप्लाई नहीं होने से मरीजों के शरीर में रजिस्टेंस पैदा हो रहा था। 24 मार्च को वर्ल्ड टीबी डे मनाया जाएगा। पत्रिका ने ऐसे में बीमारी के बदलते ट्रेंड व दवाओं की उपलब्धता पर विशेषज्ञों से चर्चा की। राहत वाली बात ये है कि टीबी की पहचान के लिए की जाने वाली सीबी-नॉट जांच भी हो रही है। केंद्र से दवा रेगुलर मिल रही है। वहीं बाजार में भी दवा उपलब्ध है।
मरीजों को 6 माह की दवा फ्री
टीबी के मरीजों के लिए केंद्र सरकार छह माह के कोर्स के लिए दवा नि:शुल्क बांटती है। 3 एफडीसी व 4 एफडीसी दवा मरीजों को नियमित रूप से दी जा रही है। ये तीन दवाओं का कांबीनेशन होता है। इसमें आइसोनाइजिड, पैराजिनामाइड व रिफापिंसिन होता है। ये टीबी के इलाज में रामबाण दवा है। नियमित दवा नहीं मिलने पर टीबी के मरीज गंभीर होकर एमडीआर टीबी के मरीज बन जाते। विशेषज्ञों के अनुसार यह सामान्य टीबी से घातक होता है। ये एक साथ 10 से ज्यादा मरीजों को संक्रमित कर सकते हैं।
कोरोना ने न केवल फेफड़े को कमजोर नहीं किया है, बल्कि इसके कई साइड इफेक्ट भी सामने आ रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार कोरोनाकाल निकलने के बाद अचानक टीबी के मरीज बढ़ गए हैं। अब जांचें भी ज्यादा हो रही हैं इसलिए मरीज भी सामने आ रहे हैं। आंबेडकर व एम्स के चेस्ट व मेडिसिन विभाग की ओपीडी में लगातार खांसी के बाद पहुंच रहे मरीजों के बलगम जांच में ट्यूबर क्लोसिस की पुष्टि हो रही है।
टीबी से फेफड़ों में छेद या फोड़ा होने पर ऑपरेशन की ज़रूरत पड़ सकती है। टीबी के करीब 60 फीसदी मरीजों को हार्ट संबंधी बीमारी होती है। इसमें पेरीकार्डिटिस कॉमन है। इसका मतलब है पेरीकार्डियम की सूजन। पेरीकार्डियम हार्ट के चारों ओर एक सुरक्षात्मक थैली जैसी झिल्ली होती है। लक्षण दिखते ही इलाज कराएं।- डॉ. कृष्णकांत साहू, एचओडी कार्डियक सर्जरी नेहरू मेडिकल कॉलेज
टीबी के मरीजों को अब नियमित दवा मिलने लगी है। 20 साल पहले की तुलना में मरीजें की मौत नगण्य हो गई है। एडवांस दवाओं से मरीजों का जीवन बढ़ गया है। मरीजों को दवा का डोज पूरा करना होगा। तभी बीमारी पूरी तरह ठीक होगी। टीबी खांसने व छींकने से भी फैलता है। इसलिए बेहतर है कि मॉस्क लगाकर रखें।
डॉ. आरके पंडा, एचओडी चेस्ट नेहरू मेडिकल कॉलेज