छत्तीसगढ़ के बलबीर की कला पहुंची विदेशों तक युवाओं को संस्कृति और रोजगार से जोड़ रहे

छत्तीसगढ़ की पारंपरिक जनजातीय चित्रकला को वैश्विक पहचान दिलाने की मुहिम

छत्तीसगढ़ की पारंपरिक जनजातीय चित्रकला को वैश्विक पहचान दिलाने की मुहिम
KAVARDHA ART NEWS । गांव के तालाब किनारे खड़े बरगद के पेड़ की चौड़ी पत्तियां ही उनकी दुनिया थीं। न रंगों की कोई बड़ी पेटी थी, न महंगे कैनवास, न ही कोई आधुनिक स्टूडियो। लेकिन उन्हीं पत्तियों पर उभरती आंखें, चेहरे, पशु-पक्षी और जनजातीय जीवन के दृश्य एक ऐसे कलाकार की पहचान बन गए, जिसने छत्तीसगढ़ की पारंपरिक जनजातीय कला को गांव की सीमाओं से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा दिया। कबीरधाम जिले के ग्राम गिरधारीकापा के युवा चित्रकार बलबीर प्रसाद विश्वकर्मा आज इसी संकल्प, साधना और सामाजिक जुड़ाव की मिसाल हैं।
बलबीर की कला यात्रा केवल एक कलाकार की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सांस्कृतिक संघर्ष की कहानी भी है, जिसमें एक युवा ने अपनी जड़ों को बचाने, उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने और उन्हें आजीविका का साधन बनाने का बीड़ा उठाया। उनकी कलाकृतियां दिल्ली, भोपाल, रायपुर, हरियाणा, राजस्थान से लेकर लंदन तक प्रदर्शित हो चुकी हैं। लेकिन बलबीर के लिए यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत नहीं है। वे मानते हैं कि जब उनकी कला दुनिया तक पहुंचती है, तो उसके साथ छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति, लोकजीवन और परंपराएं भी पहुंचती हैं।
कला नहीं, संस्कृति का जीवंत दस्तावेज
बलबीर प्रसाद विश्वकर्मा जनजातीय चित्रकला को केवल सजावटी कला नहीं मानते। उनके अनुसार यह कला आदिवासी समाज के जीवन, प्रकृति, विश्वास, उत्सव, श्रम और सामूहिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। जंगल, जल, जमीन, खेती, पशु-पक्षी, पर्व-त्योहार, विवाह, जन्म, मृत्यु और सामाजिक संबंध—इन सबका चित्रात्मक रूप जनजातीय कला में दिखाई देता है। हर रेखा, हर रंग और हर आकृति अपने भीतर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचने वाली कहानी समेटे रहती है।
वे कहते हैं कि आधुनिकता के तेज बहाव में जब कई पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही हैं, तब जनजातीय चित्रकला को बचाना केवल कला का संरक्षण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान की रक्षा भी है। इसी सोच ने उन्हें चित्रकार से आगे बढ़कर एक सांस्कृतिक कार्यकर्ता की भूमिका में ला खड़ा किया।
बरगद की पत्तियां बनीं पहली कैनवास
बलबीर की कला यात्रा की शुरुआत किसी कला विद्यालय या प्रशिक्षण संस्थान से नहीं हुई। उनके बड़े भाई प्रभात विश्वकर्मा स्वयं कला से जुड़े रहे और बचपन में बलबीर उनके साथ गांव-गांव जाते थे। वहां कलाकारों को मिलने वाला सम्मान, लोगों का अपनापन और कला के प्रति समाज का आकर्षण देखकर उनके मन में भी चित्रकला के प्रति गहरी रुचि पैदा हुई।
लेकिन संसाधन सीमित थे। ऐसे में गांव के तालाब किनारे खड़े बरगद के पेड़ की चौड़ी पत्तियां उनकी पहली कैनवास बनीं। उन्हीं पत्तियों पर उन्होंने आंखें, चेहरे, पक्षी, पशु और लोकजीवन की आकृतियां बनानी शुरू कीं। यह अभ्यास धीरे-धीरे शौक से जुनून और फिर जीवन के उद्देश्य में बदल गया। बरगद की पत्तियों पर बनी शुरुआती रेखाओं ने ही आगे चलकर उन्हें जनजातीय चित्रकला की बारीकियों को समझने और उसे अपनी पहचान बनाने की दिशा दी।
आज जब उनकी कलाकृतियां बड़े मंचों पर सराही जाती हैं, तब भी वे उस बरगद के पेड़ और उन पत्तियों को नहीं भूलते, जिन्होंने उन्हें पहली बार यह सिखाया था कि कला के लिए संसाधनों से ज्यादा जरूरी है दृष्टि, धैर्य और समर्पण।
चित्रकला को बना दिया जन आंदोलन
बलबीर का मानना है कि कोई भी लोक कला तभी जीवित रहती है, जब वह समाज के बीच सांस लेती रहे। यदि कला केवल दीवारों, प्रदर्शनियों या संग्रहालयों तक सीमित हो जाए, तो उसका भविष्य कमजोर पड़ जाता है। इसी सोच के साथ उन्होंने भोरमदेव आदिवासी चितेरे फाउंडेशन के माध्यम से जनजातीय चित्रकला को गांव-गांव, स्कूलों और सार्वजनिक स्थलों तक पहुंचाने का अभियान शुरू किया।
वे बच्चों और युवाओं को निःशुल्क प्रशिक्षण देते हैं। स्कूलों, कॉलेजों, शासकीय भवनों और सार्वजनिक दीवारों पर पारंपरिक चित्रांकन कर वे लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़ रहे हैं। उनका मानना है कि जब बच्चे अपनी ही दीवारों पर अपनी संस्कृति के चित्र देखेंगे, तब उनके भीतर अपनी विरासत के प्रति सम्मान और जुड़ाव पैदा होगा। यही जुड़ाव आगे चलकर संरक्षण में बदलता है।
बलबीर केवल चित्र बनाकर रुकते नहीं। वे बच्चों को बताते हैं कि हर आकृति के पीछे क्या अर्थ है, कौन-सा रंग किस भावना का प्रतीक है, और किस तरह जनजातीय जीवन प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलता है। इस तरह वे कला को केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि समझने और जीने की प्रक्रिया बनाते हैं।
कला बने आत्मनिर्भरता का आधार
बलबीर प्रसाद विश्वकर्मा जनजातीय चित्रकला को केवल सजावटी कला नहीं मानते। उनके अनुसार यह कला आदिवासी समाज के जीवन, प्रकृति, विश्वास, उत्सव, श्रम और सामूहिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। जंगल, जल, जमीन, खेती, पशु-पक्षी, पर्व-त्योहार, विवाह, जन्म, मृत्यु और सामाजिक संबंध इन सबका चित्रात्मक रूप जनजातीय कला में दिखाई देता है। हर रेखा, हर रंग और हर आकृति अपने भीतर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचने वाली कहानी समेटे रहती है।
वे मानते हैं कि आज दुनिया में हस्तनिर्मित, पारंपरिक और सांस्कृतिक कलाओं की मांग लगातार बढ़ रही है। यदि कलाकारों को आधुनिक डिजाइन, डिजिटल प्लेटफॉर्म, प्रदर्शनियों, पर्यटन और ऑनलाइन बाजार से जोड़ा जाए, तो छत्तीसगढ़ की जनजातीय कला हजारों परिवारों की आर्थिक स्थिति बदल सकती है। उनके अनुसार कला को केवल शौक या विरासत मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है, उसे आजीविका, उद्यम और पहचान से जोड़ना होगा।
इसी उद्देश्य से वे युवाओं को न केवल चित्रकला सिखाते हैं, बल्कि उन्हें यह भी समझाते हैं कि कला को कैसे प्रस्तुत किया जाए, कैसे उसका दस्तावेजीकरण हो, कैसे उसे बाजार तक पहुंचाया जाए और कैसे उसकी मौलिकता को बनाए रखते हुए उसे समकालीन जरूरतों के अनुरूप ढाला जाए।
देश से लेकर लंदन तक मिली पहचान
बलबीर की कला अब राष्ट्रीय सीमाओं से आगे निकल चुकी है। उनकी प्रदर्शनियां दिल्ली, भारत भवन भोपाल, रायपुर, हरियाणा, राजस्थान सहित लंदन तक आयोजित हो चुकी हैं। यह उपलब्धि केवल एक कलाकार की नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की जनजातीय कला की भी है, जिसने वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
वर्ष 2016 में विमुद्रीकरण विषय पर बनाई गई उनकी पेंटिंग को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला। इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय सेवा सम्मान, देशभक्त रचनाकार सम्मान, बेस्ट आर्टिस्ट अवार्ड, हिंदी रत्न सम्मान, मदर्स टेरेसा सम्मान तथा भोरमदेव सेंचुरी तितली सम्मान-2024 सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। इन पुरस्कारों ने उनकी कला को पहचान दी, लेकिन बलबीर के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि तब होती है जब कोई बच्चा पहली बार जनजातीय चित्र बनाकर मुस्कुराता है या कोई युवा इस कला को अपनाकर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ाता है।
विश्वस्तरीय जनजातीय आर्ट गैलरी का सपना
बलबीर का सपना केवल अपनी कला को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं है। वे छत्तीसगढ़ में एक ऐसी विश्वस्तरीय जनजातीय आर्ट गैलरी** स्थापित करना चाहते हैं, जहां भारत और दुनिया की विभिन्न जनजातीय कलाओं का संग्रह, अध्ययन और प्रदर्शन हो। उनका मानना है कि ऐसी गैलरी** न केवल पर्यटन को बढ़ावा देगी, बल्कि स्थानीय कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय पहचान और नए अवसर भी प्रदान करेगी।
वे चाहते हैं कि यह गैलरी शोधकर्ताओं, छात्रों, कलाकारों और पर्यटकों के लिए ऐसा केंद्र बने, जहां जनजातीय कला को केवल देखा ही नहीं, बल्कि समझा, सीखा और महसूस किया जा सके। उनके अनुसार यदि छत्तीसगढ़ में ऐसा केंद्र बनता है, तो यह राज्य को जनजातीय कला के वैश्विक मानचित्र पर स्थापित कर सकता है।
सरकार और समाज दोनों की भूमिका जरूरी
बलबीर का कहना है कि लोक और जनजातीय कला का संरक्षण केवल कलाकारों की जिम्मेदारी नहीं हो सकता। इसके लिए सरकार, शैक्षणिक संस्थानों, स्थानीय निकायों और समाज को मिलकर काम करना होगा। स्कूलों में स्थानीय कला को पाठ्यक्रम से जोड़ना, नियमित कार्यशालाएं आयोजित करना, कलाकारों को बाजार उपलब्ध कराना और सार्वजनिक भवनों में स्थानीय चित्रकला को प्राथमिकता देना समय की जरूरत है।
वे मानते हैं कि यदि यह प्रयास व्यापक स्तर पर किए जाएं, तो छत्तीसगढ़ की जनजातीय कला आने वाले वर्षों में भारत की सांस्कृतिक पहचान का सबसे मजबूत प्रतीक बन सकती है। साथ ही यह कला ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला स्व-सहायता समूहों, युवा उद्यमियों और पर्यटन क्षेत्र को भी नई दिशा दे सकती है।
लोगों को जोड़ने की कला
बलबीर की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे कला को लोगों से जोड़ना जानते हैं। वे गांवों में जाकर बच्चों को सिखाते हैं, स्कूलों में कार्यशालाएं लेते हैं, सार्वजनिक दीवारों पर चित्र बनाते हैं और युवाओं को यह विश्वास दिलाते हैं कि उनकी अपनी संस्कृति भी आधुनिक दुनिया में सम्मान पा सकती है। यही कारण है कि उनकी कला केवल देखने की चीज नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम बन गई है।
बलबीर प्रसाद विश्वकर्मा वे कहते हैं कि जब कोई बच्चा अपनी संस्कृति के चित्र को पहचानता है, जब कोई युवा उसे सीखकर कमाई का जरिया बनाता है, और जब कोई परिवार अपने घर की दीवार पर जनजातीय कला को स्थान देता है, तभी असली संरक्षण शुरू होता है। उनके लिए कला का अर्थ केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि सहभागिता है।
लोक और जनजातीय कला केवल हमारी विरासत नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान है। यदि युवाओं को प्रशिक्षण, मंच और बाजार मिले तो यही कला हजारों परिवारों की आजीविका बन सकती है। हमारी कोशिश है कि यह कला केवल संग्रहालयों तक सीमित न रहे, बल्कि हर घर, हर स्कूल और दुनिया के हर कला मंच तक पहुंचे।

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