महिलाओं की यह एकजुटता ही रायगढ़ के इस औद्योगिक अंधकार में उजाला ला सकती है

हर महिला को सबसे पहले खुद के भीतर की ताकत को पहचान कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना होगा।

रायगढ़/तमनार। छत्तीसगढ़ का औद्योगिक गढ़ कहा जाने वाला रायगढ़ जिला इस समय एक मूक सामाजिक और पर्यावरणीय क्रांति का गवाह बन रहा है। दशकों से विकास की वेदी पर अपनी जमीन, आजीविका और स्वास्थ्य की आहुति दे रही आदिवासी महिलाओं ने अब अपनी खामोशी तोड़ने का फैसला कर लिया है। बीते 30 वर्षों से जमीनी स्तर पर महिलाओं के अधिकारों और पर्यावरणीय न्याय के लिए संघर्ष कर रही सामाजिक कार्यकर्ता रिनचिन ने रायगढ़ और तमनार के प्रभावित गांवों का दौरा कर महिलाओं को एकजुट होने का आह्वान किया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि पितृसत्तात्मक बेड़ियों और कॉर्पोरेट शोषण के चक्रव्यूह से निकलने के लिए महिलाओं को खुद ही अपनी ढाल और तलवार बनना होगा।
औद्योगीकरण की सबसे भारी कीमत यदि किसी को चुकानी पड़ी है, तो वो दोहरी और तिहरी चुनौतियों के चक्रव्यूह में फंसी इस अंचल की आदिवासी महिलाएं हैं। रिनचिन के अनुसार, यहां की महिलाएं इस समय ‘दोहरी और तिहरी’ चुनौतियों का सामना कर रही हैं। एक तरफ जहां वे घर, परिवार और आजीविका की धुरी हैं, वहीं दूसरी तरफ जल, जंगल और जमीन पर बढ़ते कॉर्पोरेट कब्ज़े ने उनके पारंपरिक संसाधनों को उनसे छीन लिया है।
विस्थापन और मुआवजे की नीतियों में मौजूद लैंगिक असमानता को उजागर करते हुए रिनचिन कहती हैं:”जब भी खदानों या उद्योगों के लिए आदिवासी भूमि का अधिग्रहण किया जाता है, तो मुआवजे की राशि और जमीन के मालिकाना हक का अधिकांश हिस्सा पुरुषों के हाथों में चला जाता है। महिला, जो उस जमीन पर दिन-रात मेहनत करती है और आजीविका चलाती है, पुनर्वास की प्रक्रियाओं में हाशिए पर धकेल दी जाती है। इस व्यवस्था ने महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से पुरुषों पर और अधिक निर्भर बना दिया है।”इस आर्थिक वंचना के साथ-साथ महिलाओं को घरेलू और सामाजिक स्तर पर पितृसत्तात्मक सोच का भी सामना करना पड़ता है। हक की बात करने पर उन्हें न सिर्फ व्यवस्था से, बल्कि कई बार अपने ही समाज से भी लड़ना पड़ता है।
दिल्ली से भी ज्यादा जहरीली हुई रायगढ़ की हवा
पानी में घुला धीमा जहर रायगढ़ और तमनार क्षेत्र की पर्यावरणीय स्थिति है। रिनचिन ने आंकड़ों और जमीनी हकीकत का हवाला देते हुए देश का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है। अमूमन देश की राजधानी दिल्ली के वायु प्रदूषण (AQI) पर राष्ट्रीय मीडिया में खूब हो-हल्ला मचता है, लेकिन रायगढ़ के औद्योगिक क्षेत्रों और कोयला खदानों के आसपास की स्थिति दिल्ली से भी बदतर हो चुकी है।
खदानों से उड़ने वाली काली राख और उद्योगों के धुएं ने यहाँ की आबोहवा को पूरी तरह जहरीला बना दिया है। स्थिति केवल हवा तक सीमित नहीं है; यहां का भूजल भी अब पीने योग्य नहीं रहा। पानी में आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे घातक रसायनों की मौजूदगी पाई गई है, जो सीधे तौर पर इंसानी हड्डियों और अंगों को गला रहे हैं।
घर-घर में टीबी और असमय मौतें
इस प्रदूषण का सबसे सीधा और क्रूर असर स्थानीय मजदूरों और ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। कोयला धूल (Coal Dust) के लगातार संपर्क में रहने के कारण खदान श्रमिकों और आसपास के ग्रामीणों में ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) और सांस की अन्य गंभीर बीमारियां महामारी का रूप ले चुकी हैं। पिछले कुछ वर्षों में इस अंचल में फेफड़ों की बीमारियों के कारण दर्जनों असमय मौतें हुई हैं, जिनमें महिलाओं और बच्चों की संख्या चिंताजनक है।
कानूनी हथियारों से लैस हो रही हैं ग्रामीण महिलाएं
इस निराशाजनक माहौल के बीच रिनचिन और उनकी टीम आशा की एक नई किरण बनकर उभरी है। केवल भाषणों या विरोध-प्रदर्शनों तक सीमित न रहकर, रिनचिन ने कानूनी और संवैधानिक साक्षरता को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है। वे प्रभावित गांवों में घूम-घूमकर महिलाओं और ग्रामीणों को कानून की ताकत से परिचित करा रही हैं।
रिनचिन के अभियान के मुख्य स्तंभ
धरातल पर दिख रहा बदलाव
संवैधानिक अधिकारों का बोध ग्रामीण अब पांचवीं अनुसूची और पेसा (PESA) कानून के तहत अपने अधिकारों को समझने लगे हैं।
मुफ्त कानूनी सहायता
खदानों और पर्यावरण प्रदूषण के खिलाफ अदालती लड़ाई लड़ने के लिए ग्रामीणों को कानूनी ड्राफ्टिंग और वकील उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
सरकारी योजनाओं की निगरानी
सीएसआर (CSR) फंड और जिला खनिज संस्थान न्यास (DMFT) के पैसों का सही इस्तेमाल करवाने के लिए महिलाएं अब प्रशासन से सीधे सवाल कर रही हैं।इस कानूनी साक्षरता का ही परिणाम है कि अब रायगढ़ के दूरदराज के गांवों की महिलाएं जिला कलेक्टर कार्यालय और जनसुनवाइयों (Public Hearings) में बिना किसी डर के, पूरी तार्किकता के साथ अपनी बात रख रही हैं। जो महिलाएं कभी घूंघट या बंदिशों में सिमटी थीं, वे अब उद्योगों के प्रबंधन के सामने अपनी जमीन का हिसाब मांग रही हैं।
खुद लड़नी होगी लड़ाई, एकजुटता ही सबसे बड़ी ताकत
 
रायगढ़ की इस पूरी जमीनी हकीकत को करीब से देखने के बाद यह स्पष्ट है कि बदलाव की बयार आ चुकी है। जैसा कि रिनचिन का स्पष्ट संदेश है—”अपने हक के लिए लड़ना खुद को ही पड़ता है।” कोई भी बाहरी मसीहा आकर रातों-रात परिस्थितियां नहीं बदल सकता। हर महिला को सबसे पहले खुद के भीतर की ताकत को पहचानना होगा, जागरूक बनना होगा और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना होगा।
पितृसत्तात्मक ढांचे को ढहाने और एक समतामूलक, सुरक्षित समाज के निर्माण के लिए महिलाओं की यह एकजुटता ही रायगढ़ के इस औद्योगिक अंधकार में उजाला ला सकती है। जल, जंगल, जमीन और अपनी आने वाली पीढ़ियों की सलामत सांसों के लिए शुरू हुआ यह संघर्ष अब रुकने वाला नहीं है। प्रशासन और उद्योगपतियों को अब यह समझ लेना होगा कि वे अब किसी लाचार आबादी से नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के प्रति सजग और संगठित नारी शक्ति से रूबरू हैं।

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