नारी शक्ति: कला से बदली गांव की सूरत…, जानें सोनाली चक्रवर्ती की ये कहानी

पश्चिम बंगाल की संथाल कला को फिर से जीवंत करने की कोशिश कर रही हैं कलकत्ता की सोनाली चक्रवर्ती। उन्होंने अपने साथी गोपाल पोद्दार के साथ मिलकर बीरभूमि के शांतिनिकेतन के पास स्थित गांव में संथाल कला को जीवंत करने का जिम्मा उठाते हुए इसे देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाया। उनके इस प्रयास से न केवल 100 लोगों को प्रतिदिन रोजगार मिल रहा है बल्कि 2500 से अधिक महिलाओं को छोटी-छोटी कार्यशालाओं के माध्यम से प्रशिक्षण भी मिल चुका है। उन्होंने भित्ति चित्रों के अलावा इसे नया रूप दिया है।
फैशन शो का हिस्सा बने
वह बताती हैं कि इस कला को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने इसे सरकार की कई योजनाओं से जोड़ा। इसके साथ ही संथाल कला के माध्यम से उन्होंने फैशन की दुनिया में जगह बनाई। आदिवासी कलाकारों की ओर से तैयार किए गए संथाल कला के कपड़ों को कई फैशन शो में हिस्सा बनने का मौका मिला और उनकी डिजाइन्स को सहारा गया। वह बताती हैं कि यह कला इस समुदाय के साथ ही न रह जाए, इसके लिए वह ग्रामीणों के साथ मिलकर एक शिक्षण- प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं ताकि आने वाली पीढ़ी संथाल सीख सके और उसे आगे बढ़ा सके।

गांव को बनाया हरा-भरा
वह बताती हैं कभी यह गांव सूखा और बंजर भूमि के रूप में पहचान रखता था। आज यह यहां 56 हजार से अधिक पेड़ों का हरा-भरा जंगल बन चुका है। यहां लोग अब जैविक खेती करने लगे हैं।
पहले हाशिये पर था समुदाय
वह बताती हैं कि परपंराओं, त्योहारों और सांस्कृतिक विरासत को भित्ति चित्रों और नृत्यों के माध्यम से व्यक्त करने वाला संथाल समुदाय हाशिये पर पहुंच रहा है। इनके पास न रोजगार है न कला को आगे बढ़ाने का जरिया। इसके लिए उन्होंने 2012 में काम शुरू किया। इसेे न केवल पर्यटन के रूप में पहचान दिलाई बल्कि कला को कपड़ों पर उतार कर फैशन का रूप में प्रस्तुत किया।











