Diwali 2025: चार गर्भगृह वाला देश का एकमात्र देवी लक्ष्मी मंदिर

कर्नाटक के हासन जिले में स्थित डोड्डागड्डावल्ली का लक्ष्मी मंदिर दक्षिण भारत की स्थापत्य परंपरा का एक अनमोल रत्न है। यह मंदिर न केवल देवी लक्ष्मी की उपासना का प्रमुख केंद्र है, बल्कि होयसला वंश की कलात्मक दृष्टि और स्थापत्य कौशल का जीवंत उदाहरण है।
विशेष गर्भगृह के लिए पहचान… यह लक्ष्मी मंदिर अपने चार गर्भगृह (संयुक्त मंदिर योजना) के कारण अनोखा है। मुख्य गर्भगृह में देवी महालक्ष्मी की मूर्ति स्थापित है, जो शांति-समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। शेष तीन में भगवान विष्णु, देवी काली और शिव की प्रतिमाएं स्थित हैं। मंडप तराशे गए खंभों और गुंबदों से सुसज्जित है। यह बहुधार्मिक स्थापत्य दृष्टिकोण उस समय की सांस्कृतिक समरसता को भी दर्शाता है।
आस्था और दीपावली का उत्सव
हर वर्ष दीपावली के अवसर पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। मंदिर को दीपों से सजाया जाता है और देवी लक्ष्मी का विशेष महाअभिषेक किया जाता है। श्रद्धालु यहां समृद्धि और सौभाग्य की कामना के साथ दीप जलाते हैं। यह मंदिर आज भी दक्षिण भारत की सांस्कृतिक धरोहर और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। डोड्डागड्डावल्ली का लक्ष्मी मंदिर न केवल इतिहास का गौरवशाली स्मारक है, बल्कि यह भारतीय कला, धर्म और विश्वास की अमिट गाथा भी कहता है।

स्थापत्य और कलात्मक विशेषताएं
मंदिर के बाहरी हिस्से पर की गई नक्काशियों में देवी-देवताओं, अप्सराओं, पशु-पक्षियों और फूलों की आकृतियां बारीकी से उकेरी गई हैं। होयसला शैली की यह विशेषता है कि मंदिर किसी ऊंचे मंच पर नहीं, बल्कि भूमि स्तर पर निर्मित होता है।
इतिहास और निर्माण की कहानी
12वीं शताब्दी में होयसला साम्राज्य के काल में निर्मित यह मंदिर उस युग की धार्मिक आस्था और कलात्मक उत्कृष्टता दोनों को दर्शाता है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 1113 ईस्वी में किया गया था, जब राजा विष्णुवर्धन का शासन था। मंदिर के निर्माण में साबुन पत्थर का प्रयोग किया गया है, जो दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला की पहचान है। इसकी दीवारों और स्तंभों पर की गई सूक्ष्म नक्काशी उस काल के शिल्पकारों की अद्भुत दक्षता का परिचय देती है।











