मेरे हर फटे जूते में मेहनत की गंध है… कार्तिक जोशी

इंदौर. जब मैं 11 साल का था, तब इंदौर से राजस्थान के चारभुजानाथ तक 445 किमी पैदल यात्रा की थी। उस यात्रा ने मेरी जिंदगी की दिशा तय कर दी। वहीं से रनिंग मेरा धर्म बन गई। स्कूल की पढ़ाई के बीच दौड़ का जुनून बढ़ता गया। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, पर हौसला अडिग था। पिता ओम जोशी की चाय की दुकान थी। वो दिनभर दुकान पर मेहनत करते और रात को उसी जगह सो जाते थे।
92 जोड़ी जूते रिटायर हो चुके हैं…
कोविड में जब दुकान बंद हुई, तब घर भी चला गया। मैंने ठान लिया कि अब उनकी मेहनत का फल मैं दूंगा, अपने कदमों से। तब से अब तक मेरे 92 जोड़ी जूते रिटायर हो चुके हैं। हर जोड़ी जूता करीब 1100 किलोमीटर तक साथ देता है। मेरे हर फटे जूते में मेरी मेहनत की गंध है। वो सिर्फ स्पोर्ट्स शूज नहीं, मेरी डायरी हैं। हिमाचल प्रदेश की सोलांग वैली की बर्फीली चोटियों पर मैंने 100 किमी की स्काय रनिंग ‘दि हेल रेस’ पूरी की। वहीं फरीदाबाद की ट्रेल अथोन मैराथन में 56 किमी दूरी 4 घंटे 25 मिनट में पूरी कर रिकॉर्ड बनाया।

फिटनेस मतलब मसल्स नहीं माइंडसेट
मेरा मानना है कि फिटनेस का मतलब मसल्स नहीं, माइंडसेट है। मैं कई बार ट्रैक पर गिरा, पैरों में छाले हुए, खून निकला लेकिन कभी खुद से हार नहीं मानी। मेरा युवाओं से कहना है कि गति नहीं, निरंतरता जरूरी है। रनिंग में सफलता उन लोगों को मिलती है जो धीरे-धीरे लगातार आगे बढ़ते हैं। हर फिनिश लाइन सिर्फ जीत नहीं, एक नया आरंभ होती है। देश के हर युवा को किसी न किसी क्षेत्र में दौड़ना चाहिए क्योंकि जब युवा दौड़ते हैं, देश आगे बढ़ता है। मेरे लिए जीत मेडल नहीं प्रेरणा है जो किसी और को जूते पहनने की हिम्मत दे।
असल लड़ाई मन से होती है
रनिंग सिर्फ शरीर को नहीं, मन को भी प्रशिक्षित करती है। जब आप लंबी दौड़ में होते हैं, तो असल लड़ाई पैरों से नहीं, मन से होती है। लंबी दूरी की दौड़ शरीर को नहीं, सोच को मजबूत करती है। यह आपको सिखाती है कि हार कबूल करना आसान है, पर धैर्य रखना असली जीत है।











