उज्जैन की परंपरा.. धन की कामना में कुबेर देव की नाभि पर लगेगा इत्र

उज्जैन. धनतेरस पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मध्यप्रदेश की कुबेर नगरी उज्जैन के सांदीपनि आश्रम और महाकालेश्वर मंदिर के कोटितीर्थ कुंड के समीप स्थित प्राचीन कुबेर प्रतिमा के दर्शन के लिए पहुंचेंगे। परंपरा के अनुसार इस दिन भक्त कुबेर देव की नाभि में इत्र अर्पित कर सुख-समृद्धि, धन और वैभव की कामना करते हैं।

सांदीपनि आश्रम परिसर में 84 महादेवों में से 40वें क्रम पर स्थित श्री कुंडेश्वर महादेव मंदिर के गर्भगृह में यह दुर्लभ कुबेर प्रतिमा विराजित है। कुबेर देव की यह प्रतिमा बैठी हुई मुद्रा में है। एक हाथ में सोम पात्र और दूसरा वर मुद्रा में है। मंदिर के पुजारी पंडित शिवांश व्यास ने बताया कि परंपरा है कि कुबेर की नाभि पर इत्र लगाने से घर में स्थायी लक्ष्मी का वास होता है। महाकालेश्वर मंदिर में भी विशेष पूजन: उज्जैन को प्राचीन काल से ही कुबेर नगरी कहा गया है। मान्यता है कि यहीं भगवान कुबेर ने कठोर तपस्या कर धनाधिपति का पद प्राप्त किया था।

देशभर के प्रमुख कुबेर मंदिर…

मंदसौर (मध्य प्रदेश): यह मंदिर मध्य प्रदेश के प्राचीन कुबेर मंदिरों में से एक है। यहां की प्रतिमा लगभग 1300 वर्ष पुरानी है। कुबेर को नेवले पर सवार दर्शाया गया है और उनके हाथों में धन की पोटली, शस्त्र और प्याला हैं।

ओंकारेश्वर मंदिर, खंडवा (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश के तीन प्रमुख कुबेर मंदिरों में यह सर्वाधिक प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि कुबेर देव ने यहां कठोर तपस्या कर शिवलिंग की स्थापना की थी।

वडोदरा (गुजरात): नर्मदा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर लगभग 2500 वर्ष पुराना माना जाता है। धनतेरस और दीपावली पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

जागेश्वर धाम (उत्तराखंड): 7वीं से 14वीं शताब्दी के बीच कत्यूरी राजवंश द्वारा निर्मित इस क्षेत्र में भव्य मंदिर समूह हैं। यहां कुबेर जी की पूजा एकलिंग रूप में होती है।

काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी): यहां भगवान शिव के साथ कुबेर जी की प्रतिमा भी स्थापित है। मान्यता है कि काशी में धन और वैभव की रक्षा स्वयं कुबेर करते हैं।

कांचीपुरम (तमिलनाडु): प्राचीन शिल्पकला से निर्मित यह मंदिर कुबेर उपासना का दक्षिण भारत में एक प्रमुख ऐतिहासिक स्थल है।

इसी आश्रम में कृष्ण बने ‘श्रीकृष्ण’

मान्यता है कि यहीं सांदीपनि आश्रम में भगवान कृष्ण की पढ़ाई के बदले गुरु दक्षिणा में कुबेर धन लेकर पहुंचे। गुरु ने धन लौटा दिया और शंखासुर से उनके पुत्र को मुक्त करवाने को कहा। कृष्ण ने ऐसा ही किया। प्रसन्न होकर गुरु-माता ने उन्हें ‘श्री’ प्रदान की। बाद में कुबेर इसी आश्रम में विराजमान हो गए।

1400 वर्ष प्राचीन है कुबेर प्रतिमा

पुरातत्ववेत्ता डॉ. रमण सोलंकी के अनुसार, कुंडेश्वर मंदिर में स्थापित कुबेर प्रतिमा परमार कालीन है और लगभग 1400 वर्ष प्राचीन मानी जाती है। उभरा पेट, तीखी नाक और शरीर पर अलंकरण कुबेर के ऐश्वर्यपूर्ण स्वरूप को दर्शाते हैं। कुबेर देव के दोनों कंधों पर धन की पोटलियां हैं।

SARITA DUBEY

बीते 24 सालों से पत्रकारिता से जुड़ी है इस दौरान कई बडे अखबार में काम किया और अभी वर्तमान में पत्रिका समाचार पत्र रायपुर में अपनी सेवाए दे रही हैं। महिलाओं के मुद्दों पर लंबे समय से काम कर रही है।
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