उम्र नहीं, जुनून से मिलती है सफलता: 52 की उम्र में बनीं ‘पचौली लेडी’ रीनू छाबड़ा की प्रेरक कहानी

सही सोच, सही दिशा और निरंतर प्रयास के साथ कोई भी व्यक्ति अपने जीवन को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है

रायपुर। CG WOMAN  NEWS “सीखने की कोई उम्र नहीं होती”—यह सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की 52 वर्षीय रीनू छाबड़ा की जीवन कहानी का सार है। आर्थिक चुनौतियों, करियर बदलाव और सामाजिक सीमाओं को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने यह साबित किया है कि अगर मन में जुनून हो, तो सफलता उम्र की मोहताज नहीं होती।

आज रीनू छाबड़ा पूरे प्रदेश में ‘पचौली लेडी’ के नाम से जानी जाती हैं। लेकिन उनकी सफलता का यह सफर आसान नहीं था—यह संघर्ष, प्रयोग और निरंतर सीखने की कहानी है।


करियर में कई मोड़, लेकिन सीखने की ललक बरकरार

रीनू छाबड़ा का शुरुआती करियर काफी अलग रहा। उन्होंने शादी से पहले मर्चेंट नेवी में मरीन रेडियो ऑफिसर के रूप में काम किया। इसके बाद उन्होंने करीब 10 वर्षों तक कॉर्पोरेट सेक्टर में अपनी सेवाएं दीं।

लेकिन जिंदगी ने नया मोड़ तब लिया जब उन्होंने स्थिर नौकरी छोड़कर कुछ नया करने का फैसला किया। यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन यही उनकी सफलता की नींव बना।


42 की उम्र में खेती की शुरुआत: जोखिम से अवसर तक

जहां अधिकांश लोग 40 की उम्र के बाद स्थिरता तलाशते हैं, वहीं रीनू ने 42 वर्ष की उम्र में खेती-किसानी में कदम रखा। उन्होंने एक एनजीओ की स्थापना की और वन विभाग के साथ मिलकर आधुनिक कृषि तकनीकों, जैविक खेती और वर्मी कम्पोस्ट के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जुड़ीं।

इसी दौरान उन्होंने एक बड़ा अवसर पहचाना—औषधीय खेती (Medicinal Farming)


पचौली ने बदली किस्मत: डेटा में सफलता की कहानी

साल 2015 में उन्होंने महासमुंद जिले के बागबाहरा ब्लॉक के देवरी गांव में 10 एकड़ जमीन पर सागौन, लेमनग्रास और पचौली की इंटरक्रॉपिंग शुरू की।

पहले साल के आंकड़े:

  • कुल उत्पादन: लगभग 250 लीटर पचौली तेल
  • बाजार मूल्य: करीब ₹6000 प्रति लीटर
  • अनुमानित आय: ₹15 लाख तक

यह परिणाम उनके लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। पचौली तेल की मांग भारत ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी लगातार बनी रहती है, क्योंकि इसका उपयोग परफ्यूम, कॉस्मेटिक्स और औषधीय उत्पादों में किया जाता है।


आज 40 एकड़ में फैला व्यवसाय

रीनू छाबड़ा का काम अब छोटे स्तर से आगे बढ़ चुका है। आज वे अपनी बहन के साथ देवरी और तुपकबोरा क्षेत्र में लगभग 40 एकड़ भूमि पर औषधीय खेती कर रही हैं।

वर्तमान खेती मॉडल:

  • प्रमुख फसलें: पचौली, लेमनग्रास, सागौन
  • पचौली क्षेत्र (इस वर्ष): लगभग 20 एकड़
  • प्रति एकड़ संभावित आय: ₹2 लाख तक

इस मॉडल ने न केवल उनकी आय बढ़ाई, बल्कि स्थानीय किसानों के लिए भी एक नया विकल्प प्रस्तुत किया है।

 


महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा

रीनू छाबड़ा आज उन महिलाओं के लिए एक मिसाल हैं जो उम्र, पारिवारिक जिम्मेदारियों या आर्थिक समस्याओं के कारण अपने सपनों को पीछे छोड़ देती हैं।

वे न सिर्फ खुद खेती कर रही हैं, बल्कि अन्य लोगों को भी प्रशिक्षित कर रही हैं और उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं।


रीनू छाबड़ा का संदेश

“मैंने जीवन में हमेशा कुछ नया सीखने की कोशिश की है और आज भी सीख रही हूं। महिलाएं हर क्षेत्र में सफल हो सकती हैं—बस उनके अंदर आत्मविश्वास और कुछ करने का जुनून होना चाहिए। आर्थिक परेशानी कभी बाधा नहीं बनती, अगर आगे बढ़ने की इच्छा मजबूत हो।”


सफलता की सीढ़ियां (Key Milestones)

  • मर्चेंट नेवी में मरीन रेडियो ऑफिसर के रूप में करियर की शुरुआत
  • कॉर्पोरेट सेक्टर में 10 वर्षों का अनुभव
  • 42 वर्ष की उम्र में खेती की शुरुआत
  • 2015 में औषधीय खेती की दिशा में कदम
  • पचौली उत्पादन में उल्लेखनीय सफलता
  • 40 एकड़ में फैला कृषि व्यवसाय
  • ‘पचौली लेडी’ के रूप में पहचान

बड़ी सीख (Key Takeaways)

  • उम्र नहीं, सोच और मेहनत सफलता तय करती है
  • कृषि में औषधीय फसलों का भविष्य उज्ज्वल है
  • इंटरक्रॉपिंग मॉडल से आय कई गुना बढ़ाई जा सकती है
  • महिलाएं कृषि उद्यमिता में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं

 

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