दंतेवाड़ा की बुधरी तांती को पद्मश्री पुरस्कार, बोलीं- सम्मान मिलने से मैं समाज की आभारी हूं..

बस्तर जिले के बीहड़ में दंतेवाड़ा वहां से भी अंदरुनी इलाका था बारसूर, 1990 में जब विवाह के तत्काल बाद हमने अपने सेवा व कार्यक्षेत्र के लिए यहां आने का निर्णय लिया तो परिवार, समाज मायूस हो गए। कहा कि नासिक जैसे शहरी इलाके को छोड़कर जंगल की खाक छानना कहां तक उचित है। पर हम अपने निर्णय पर अडिग रहे। यह कहना था सुनीता गोडबोले व उनके पति रामचंद्र गोडबोले का।
गोडबोले दंपती ने तीन दशक से अधिक समय से बारसूर में ही आदिवासियों के बीच अपनी दुनिया बसा ली है। उनके इस निश्छल सेवा भाव को देखते हुए सरकार ने 2026 में उन्हें संयुक्त रुप से पद्मश्री पुरस्कार के लिए चयनित किया है। नाम की घोषणा होने के बाद भी गोडबोले दंपती की सादगी जस की तस है। पत्रिका से चर्चा में सुनीता गोडबोले ने बताया कि मैंने महाराष्ट्र में अपनी आरंभिक शिक्षा- दीक्षा पूरी की। यहां से मास्टर इन सोशल वर्क किया। जबकि मेरे पति बीएएमएस चिकित्सक थे।

जैसे ही हमारा विवाह हुआ हमारे विचार आपस में मेल खाए व हमने पिछड़े इलाके को अपना कार्यक्षेत्र चुना। दंतेवाड़ा जिला गठन से पहले उस समय यह अविभाजित बस्तर का एक हिस्सा हुआ करता था। बुनियादी सुविधाएं तक यहां नहीं थी, यहां शिक्षा, स्वास्थ्य व सामान्य स्वच्छता बनाने के लिए हम दोनों जुटे रहे।
वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की। यहां अभी 22 आदिवासी बच्चे आवासीय सुविधा हासिल कर शिक्षा ले रहे हैं। आरंभ में कोई हमारी भाषा नहीं समझता था। पर उनकी सादगी व सरलता इतनी थी कि हमें वे पूरा प्यार देने लगे। हम पर व हमारे सेवाओं पर उन्होंने विश्वास जताया। उनका विश्वास जीतना व हमें काम करने की स्वतंत्रता देना हमारे लिए पद्मश्री जैसा पुरस्कार है।
गीदम से करीब दस किमी दूर हीरानार गांव है। इस गांव की निवासी बुधरी ताती को रविवार की दोपहर मोबाइल पर एक संदेश आया कि आप को भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार के लिए चुना है। वे कुछ समझ पाती इससे पहले ही काल डिस्कनेक्ट हो गया। लेकिन इसके बाद लगातार उनका मोबाइल घनघनाने लगा। बुधरी ताती ने बताया कि जब लोगों ने उन्हें बधाई व शुभकामनाएं देना शुरू कर दिया तब पता चला कि उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री के लिए चयनित किया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने जो सम्मान दिया है व समाज को दिया है, समाज से जो सम्मान मिला है उसके लिए मैं समाज की आभारी हूं।
दंतेवाड़ा जिला की निवासी बुधरी ताती 1984 से सामाजिक कार्य से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने बताया कि ग्रामीण आदिवासियों की जीवन की दुभरता को दूर करने उन्होंने इनके हित का कार्य करने की ठान ली। बुधरी ताती ने हीरानार व उसके आसपास के इलाके में साक्षरता का प्रचार करने की ठानी। आदिवासी महिलाओं को साक्षरता का पाठ पढ़ाया। उन्हें अक्षर का ज्ञान करवाया। सीमित संसाधन के साथ वे अपने मुहिम को खुद ही आगे बढ़ाती रहीं। इसके बाद पर्यावरण, स्वच्छता व स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी काम करना एक साथ शुरू किया। आज आदिवासी अंचल में कोई समस्या होती है तो लोग बुधरी ताती को दीदी के तौर पर अपने मन की बात सुनाते हैं। वे भी पूरी तन्मयता से उनकी समस्याओं को सुनती व सुलझाने जुटी रहती हैं।











