Nari Shakti: मुरैना की सुनीता बनीं मिसाल, चाय का ठेला चलाकर संवारी बेटियों की जिंदगी, बेटों के साथ हर रोज 13 घंटे काम

Mother’s Day Special: (मुरैना से मनीष शर्मा की रिपोर्ट) मदर्स डे यानी मां के प्रति सम्मान व्यक्त करने का दिन है लेकिन मुरैना की गलियों में एक ऐसी मां भी है जिसके लिए हर दिन एक नया संघर्ष और हर सुबह एक नया संकल्प है. यह कहानी है सुनीता जैन की, जिन्होंने नियति के क्रूर प्रहारों को न केवल झेला बल्कि अपने स्वाभिमान और कड़े परिश्रम से अपने परिवार की बिखरती नैय्या को किनारे तक पहुंचाया.

अपनों को खोने का गम

सुनीता का विवाह वर्ष 2005 में दीपक जैन के साथ हुआ था. जीवन पटरी पर लौट ही रही थी कि दुखों का सिलसिला शुरू हो गया. वर्ष 2008 में सास और ससुर का साया सिर से उठ गया. अभी सुनीता इन घावों से उबरी भी नहीं थीं कि वर्ष 2020 में पति दीपक जैन की असमय मृत्यु ने उन्हें झकझोर कर रख दिया. चार छोटे बच्चों की जिम्मेदारी और आजीविका का कोई ठोस साधन नहीं, सुनीता के सामने अंधेरा था.

चाय के ठेला लगाकर संभाला परिवार

पति की मौत के बाद सुनीता ने हार मानने के बजाय श्रम को अपना साथी बनाया. घर के सारे चूल्हे-चौके का काम निपटाकर वे सुबह 7 बजे ही अपने बड़े बेटे राजू जैन के साथ चाय के ठेले पर पहुंच जाती हैं. रात 8 बजे तक लगातार काम करना, अब उनकी नियति बन गई है. इतना ही नहीं, परिवार की आय बढ़ाने के लिए वे शादी-समारोहों में खाना बनाने का काम भी पूरी तन्मयता से करती हैं.

‘…बस इरादे नेक होने चाहिए’

एक मां के लिए सबसे बड़ी चिंता अपनी बेटियों का भविष्य होती है. सुनीता ने पाई-पाई जोड़कर और समाज के सहृदय लोगों का सहयोग लेकर अपनी दोनों बेटियों के हाथ पीले किए. बड़ी बेटी राखी जैन का विवाह वर्ष 2025 में संपन्न हुआ. वहीं छोटी बेटी शशि जैन की शादी इसी वर्ष 2026 में संपन्न हुई. सीमित संसाधनों के बावजूद बेटियों को सम्मानजनक विदा करना सुनीता की सबसे बड़ी जीत रही.

आज सुनीता अपने दो बेटों, राजू और रमन जैन के साथ मिलकर जीवन का संघर्ष लड़ रही हैं. बड़ा बेटा राजू मां के कंधे से कंधा मिलाकर ठेले पर हाथ बंटाते हैं. सुनीता का मानना है कि काम कोई छोटा नहीं होता, बस इरादे नेक होने चाहिए.

13 घंटे से भी ज्यादा काम करती हैं

मदर्स डे पर जहां लोग उपहारों और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए मां को याद कर रहे हैं, वहीं सुनीता जैन जैसी महिलाएं यह सिद्ध कर रही हैं कि ‘मां’ केवल ममता की मूरत नहीं, बल्कि शक्ति का वह पुंज है जो विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानती. सुबह 7 से रात 8 बजे तक का उनका कठिन परिश्रम उनकी ममता और जिम्मेदारी की जीवंत मिसाल है.

SARITA DUBEY

बीते 24 सालों से पत्रकारिता से जुड़ी है इस दौरान कई बडे अखबार में काम किया और अभी वर्तमान में पत्रिका समाचार पत्र रायपुर में अपनी सेवाए दे रही हैं। महिलाओं के मुद्दों पर लंबे समय से काम कर रही है।
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