यह है रायपुर की आयरन लेडी जिसने दसवीं तक पढ़कर फैलाया शिक्षा का उजियारा

रजनी सिंह. राजधानी रायपुर के श्रीनगर इलाके की रहने वाली मंजू सिंह को लोग अक्सर ‘आयरन लेडी’ कहते हैं। वजह है उनका अदम्य साहस और शिक्षा के प्रति जुनून। महज दसवीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाली मंजू ने जीवन की चुनौतियों को अवसर में बदलते हुए शिक्षा का दीप जलाया।
कम संसाधनों और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने तीन स्कूल खोलकर हजारों बच्चों का भविष्य संवारा। उनके स्कूलों से पढ़े बच्चे आज देश-विदेश की बड़ी कंपनियों में काम कर रहे हैं। साल 2007 में धनेली के एक छोटे से समाज भवन से मंजू सिंह की यह यात्रा शुरू हुई थी, जो आज भनपुरी में उन्हीं के द्वारा संचालित एक और स्कूल तक पहुंच चुकी है। मंजू का यह प्रयास इस बात का प्रमाण है कि संकल्प और सकारात्मक सोच से बड़ी से बड़ी दीवार को पार किया जा सकता है।

3 स्कूल खोलकर संवार दिया हजारों बच्चों का जीवन
राजधानी के श्रीनगर की रहने वाली आयरन लेडी मंजू सिंह ने समाज को ऐसी सीख दी कि बड़ी-बड़ी डिग्री वाले भी उनके आगे खुद को छोटा महसूस करते हैं। आयरन लेडी कहने की वजह उनके चुनौती पूर्ण कार्य है कि कम संसाधनो के बावजूद उन्होंने अपनी बड़ी सोच के चलते 3 स्कूल खोले और उनके स्कूल से पढ़कर निकले बच्चे आज बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम कर रहे हैं। अभी भनपुरी में उनका अर्चना एजुकेशन इग्लिश मीडियम स्कूल चल रहा है।

52 साल की मंजू कहती हैं कि मेरी बहुत कम उम्र में शादी हो गई थी , लेकिन मन में शुरू से एक उद्देशय लेकर चल रही थी कि मुझे भी गांव और शहर के उन बच्चों को शिक्षा से जोड़ना है जो किसी कारण वश पढ़ नही पाए या स्कूल नहीं जाते थे और साल 2007 में मैंने धनेली जैसे ग्रामीण क्षेत्र में 50 बच्चों के साथ एक छोटे से स्कूल की शुरूआत की। उस समय मेरे पास इतनी रकम भी नहीं थी कि स्कूल के लिए इमारत बना लू या किराए से ले लूं। गांव के ही लोगों ने मुझे समाज का भवन दिया जिसका बहुत कम किराया लेते थे और फिर यहीं से बच्चों को पढ़ाने की शुरूआत हुई।
संदेश: मंजू सिंह कहती है कि महिलाओं को कभी भी खुद को कमजोर नही समझना चाहिए, क्योंकि महिला तो परिवार के साथ देश और समाज को भी बहुत देने की काबलियत रखती है। बस एक सकारात्मक सोच के साथ काम करने की जरूरत होती है।
3 स्कूल खोलकर कई बच्चों को जोड़ा
स्कूल के काम के साथ अपने पांच बच्चों की परवरिश भी मंजू ने बहुत ही अच्छे से की। उनके पति अब इस दुनिया में नहीं है वे मंजू के इस कार्य के पक्ष में नहीं थे लेकिन मंजू को अपना उद्देश्य पूरा करना था इस कारण उन्होंने धनेली के बाद खमतराई और भनपुरी में भी कक्षा नर्सरी से आठवीं तक का स्कूल खोला। कई बच्चे फीस नहीं भर पाते थे तो मंजू उनकी फीस माफ कर देती थी।
किसी से मदद नहीं ली
अब उनका छोटा बेटा अपनी मां के कार्य को आगे बढ़ा रहा है। मंजू बताती हैं कि उन्होंने स्कूल चलाने के लिए कभी भी किसी से आर्थिक मदद नहीं ली, बल्कि अपने बच्चों की सैलरी भी स्कूल में लगा देती थी। आज भी वे उसी जोश के साथ भनपुरी में अर्चना एजुकेशन इग्लिश मीडियम स्कूल का संचालन कर रही है।











