श्रीलक्ष्मी धाम: स्वर्ण कमल को छूने से मिलता है सुख-समृद्धि और वैभव

कोलकाता यानी देश की सांस्कृतिक राजधानी देवी उपासना के इतिहास के लिए भी ख्यात है। इसी आध्यात्मिक धरोहर के केंद्र में है श्री महालक्ष्मी मंदिर, जो समृद्धि, सौभाग्य और सुख-शांति की देवी को समर्पित है। लगभग 25000 वर्ग फुट क्षेत्रफल व 75 फुट ऊंचाई का यह मंदिर प. बंगाल का सबसे प्राचीन व प्रसिद्ध लक्ष्मी मंदिर माना जाता है। वैभवशाली भारतीय मंदिर स्थापत्य से प्रेरित यह कोलकाता का सबसे बड़ा लक्ष्मी मंदिर है।
यह है मान्यता…
हर शुक्रवार, विशेष रूप से संध्या के समय श्रद्धालुओं की भीड़ लगती है। यहां यह विश्वास प्रचलित है कि सच्चे मन से मां लक्ष्मी की आराधना करने वाला व्यक्ति कभी दरिद्र नहीं रहता। दीपावली व कोजागरी लक्ष्मी पूजा के अवसर पर महिलाएं विशेष पूजा करती हैं। इस दिन कोलकाता की गलियां रोशनी से जगमगा उठती हैं, और भक्ति गीतों की गूंज वातावरण को पवित्र बना देती है।

रोचक तथ्य
गर्भगृह में विशेष ‘स्वर्ण कमल’ रखा गया है, जिसे देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है।
माना जाता है कि इस कमल को छूने से सुख-समृद्धि और वैभव की प्राप्ति होती है।
मंदिर के बाहर एक अक्षय कुंड भी है, जहां लोग सिक्के डालकर समृद्धि की कामना करते हैं।
ऐतिहासिक महत्व
कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण लगभग 19वीं शताब्दी में हुआ था। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, एक व्यापारी ने स्वप्न में देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद पाने के बाद मंदिर निर्माण करवाया। तब से आज तक यह मंदिर कोलकाता के लोगों के आर्थिक और आध्यात्मिक जीवन का केंद्र बना हुआ है।
स्थापत्य और सौंदर्य
मंदिर की वास्तुकला बंगाल की पारंपरिक शैली में बनी है। लाल ईंटों और संगमरमर का सुंदर मेल दिखाई देता है। गर्भगृह में स्थापित देवी महालक्ष्मी की मूर्ति स्वर्णाभूषणों से अलंकृत रहती है। दीपावली की रात जब मंदिर में हजारों दीप प्रज्वलित होते हैं, तो पूरा परिसर स्वर्णिम आभा से नहा उठता है।











