पुण्यतिथि विशेष: जीवन में झेले दर्द, पर दर्शकों को गुदगुदाकर लिखा…

हिंदी सिनेमा में जब भी हंसी और कॉमेडी की बात होती है, तो कुछ चेहरे अपने आप याद आने लगते हैं। उनमें सबसे खास नाम है उमा देवी खत्री का, जिन्हें प्यार से फैंस टुनटुन कहकर बुलाते थे। सिनेमा में अपनी पहचान बनाने से पहले उमा देवी की जिंदगी का सफर काफी दर्दभरा और संघर्षों से भरपूर था। उमा देवी खत्री का जन्म 11 जुलाई 1923 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में हुआ था।

वह तकरीबन ढाई साल की थीं, जब जमीन के विवाद में उनके माता-पिता की हत्या कर दी गई। जब वह नौ साल की हुईं, तब उनके भाई की भी हत्या कर दी गई। रिश्तेदारों ने नौकरानी की तरह रखा। किशोरावस्था में उनकी मुलाकात अख्तर अब्बास काजी से हुई। उन्होंने मदद का वादा तो किया, लेकिन 1947 वह पाकिस्तान चले गए।

गिरने पर मिला नाम:

शादी के बाद उमा देवी ने सिंगिंग से दूरी बना ली, लेकिन जब आर्थिक परेशानियां बढ़ीं, तो वह फिर से काम की तलाश में नौशाद के पास पहुंचीं। नौशाद ने उन्हें व्यक्तित्व और बढ़े हुए वजन के कारण कॉमेडी की सलाह दी। उमा देवी ने शर्त रखी कि वह पहली फिल्म सिर्फ दिलीप कुमार के साथ ही करेंगी। %बाबुल% फिल्म की शूटिंग के एक सीन में उमा अचानक फिसलकर गिर गईं। सेट पर मौजूद दिलीप कुमार ने मजाक के तौर पर कहा, अरे, कोई इस टुन-टुन को उठाओ। जो उनका नाम बन गया।

बनाई राह: 1992 में पति अख्तर के निधन के बाद टुनटुन का मन फिल्मों से हटने लगा और 24 नवंबर 2003 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा। मुश्किल जिंदगी, संघर्ष और दर्द से भरी राह के बावजूद उन्होंने लाखों लोगों को हंसाया। उन्होंने सिर्फ हंसाया ही नहीं, बल्कि हिंदी फिल्मों में महिलाओं के लिए कॉमेडी का एक नया रास्ता खोला।

SARITA DUBEY

बीते 24 सालों से पत्रकारिता से जुड़ी है इस दौरान कई बडे अखबार में काम किया और अभी वर्तमान में पत्रिका समाचार पत्र रायपुर में अपनी सेवाए दे रही हैं। महिलाओं के मुद्दों पर लंबे समय से काम कर रही है।
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