अमरीका में बढ़ा ‘डिजाइनर बेबी’ का चलन, पता लगा रहे आईक्यू लेवल

केलिफोर्निया/नई दिल्ली. स्वस्थ सुंदर व बुद्धिमान बच्चे की चाहत हर माता-पिता को है। भारत सहित दुनियाभर में अच्छी संतान ईश्वर का वरदान माना जाता है लेकिन सिलिकॉन वैली की बड़ी कंपनी में काम कर रहे क्रिस्टोफर और उनकी लिव-इन पार्टनर ऐली तकनीक के माध्यम से गुणवान संतान पैदा करने के प्रयास में पिछले तीन साल से जुटे हैं।

क्रिस्टोफर ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं हैं बल्कि सिलिकॉन वैली में बड़ी संख्या में टेक फर्मों के दिग्गज उन्नत आनुवंशिक परीक्षण और भ्रूण चयन विधियों का उपयोग करके डिजानइर बेबी के जरिये स्मार्ट पीढ़ी बनाने में मोटी राशि खर्च कर रहे हैं। डिजाइनर बेबी के लिए माता-पिता ऐसी तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं जिसमें भ्रूण की बीमारी व उसका बुद्धिमत्ता स्तर (आईक्यू) पहले से मापकर भ्रूण चयन किया जाता है। आइवीएफ और सहायक प्रजनन तकनीक (एआरटी) में इसका उपयोग किया जा रहा है। पूरी विधा को आधुनिक सुजननि (मॉडर्न यूजेनिक्स) कहा जाता है।

स्टार्ट कंपनियां लाई तकनीक, खर्चा 50000 डॉलर तक

वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक अमरीका में उच्च वर्ग की नई इच्छा को भांप कर स्टार्ट अप कंपनियां ऐसी तकनीक लाई हैं जो भ्रूण के चयन से पहले ही आने वाले बच्चों में रोग के जोखिम और आइक्यू स्तर की भविष्यवाणी करती हैं। न्यूक्लियस जीनोमिक्स और हेरासाइट जैसी स्टार्टअप कंपनियां भ्रूण के आनुवंशिक परीक्षण के लिए 6,000 डॉलर से 50,000 डॉलर तक फीस लेती हैं। न्यूक्लियस जीनोमिक्स के संस्थापक कियान सादेघी ने कहा सिलिकॉन वैली में आइक्यू को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है। कियान ने बताया कि सैन फ्रांसिस्को के एक इंजीनियर दंपती ने जटिल स्कोरिंग प्रणाली अपनाकर निरोगी और हाई आइक्यू वाले भ्रूण का चयन किया। उनकी बेटी उस भ्रूण से पैदा हुई तो उसका समग्र आइक्यू लेवल ऊंचा था।

धनवान बना रहे सुपर-जाति

अमरीका में डिजाइनर बेबी के इस नए चलन पर नैतिकता और भविष्य के खतरों के बारे में बहस छिड़ी है। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में विधि एवं जैव विज्ञान केंद्र के निदेशक हेंक ग्रीली ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा यह एक विज्ञान कथा परिदृश्य है कि संपन्न लोग एक आनुवंशिक सुपर-जाति का निर्माण कर रहे हैं जो भविष्य में हावी हो जाएगी। इसके लिए नैतिक दुविधाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है लेकिन इसमें भविष्य के खतरे भी कम नहीं हैं।

भारत में ये प्रतिबंध

भ्रूण का चयन, लिंग परीक्षण और लिंग आधारित गर्भपात प्रतिबंधित।

आईवीएफ की अनुमति लेकिन में भ्रूण का प्री-इंप्लांटेशन जेनेटिक टेस्ट (पीजीटी) केवल थैलेसीमिया-हीमोफीलिया जैसी गंभीर जेनेटिक बीमारियों के लिए ही सीमित।

सहायक प्रजनन तकनीक (एआरटी) और सरोगेसी के लिए सख्त नियम।

भारत: खानपान, आचार-व्यवहार पर जोर

भारत में मॉडर्न यूजेनिक्स पर कई तरह के कानूनी प्रतिबंध हैं लेकिन अच्छी संतान की प्राप्ति के लिए खानपान, आचार-विचार-व्यवहार की शुद्धता व सात्विकता पर जोर प्राचीन काल से है। भारत में प्राचीन ग्रंथों में अच्छी संतान के लिए बाकायदा पूरा प्रोटोकॉल बताया गया है।

SARITA DUBEY

बीते 24 सालों से पत्रकारिता से जुड़ी है इस दौरान कई बडे अखबार में काम किया और अभी वर्तमान में पत्रिका समाचार पत्र रायपुर में अपनी सेवाए दे रही हैं। महिलाओं के मुद्दों पर लंबे समय से काम कर रही है।
Back to top button