सिर्फ दीपदान नहीं… फसलों की शादी और अग्निबाण से भी मनाते दिवाली

नई दिल्ली. पांच दिवसीय दीपोत्सव का उल्लास हर घर, गली-मोहल्ले में जगमगाने लगा है। उत्सव की विविधता देखिए, इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग परंपरा और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों में जहां फसलों की शादी करवाने का रिवाज है तो गोवा में इस दिन नरकासुर के पुतले का दहन होता है। मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में दिवाली की धूम के साथ गाय और ऊंटों को इस उल्लास का हिस्सा बनाते हैं। अच्छी बात ये है कि तकनीक के युग में भी युवा पीढ़ी इन परंपराओं को पूरी ईमानदारी से आगे बढ़ा रही है। जानते हैं देश की ऐसी ही कुछ रोचक और अजब-अनोखी परंपराओं के बारे में।
छत्तीसगढ़ धमतरी : एक सप्ताह पहले दीपावली
धमतरी जिले के सेमरा गांव में हर साल एक सप्ताह पहले ही दीपावली मनाई जाती है। मान्यता है कि देवता के निर्देश पर एक सप्ताह पहले त्योहार मनाया जाता है।
कवर्धा : द्वार पर मंगल गाती हैं बैगा बालिकाएं
कवर्धा के पंडरिया में बैगा-आदिवासी में रंग-बिरंगी पारंपरिक वेशभूषा में बालिकाएं हाथों में लोहे से बने वाद्ययंत्र ‘ठिस्की’ लिए घर-घर पहुंचती हैं। घर का मुखिया लड़कियों के गालों पर दीये के तेल का टीका लगाकर अभिनंदन करते हैं।

मध्यप्रदेश, छिंदवाड़ा : भारिया आदिवासियों की ‘खिरका’ परंपरा
छिंदवाड़ा. दीपावली पर पातालकोट के भारिया आदिवासी सामूहिक ‘खिरका’ कार्यक्रम की अनोखी परंपरा निभाते हैं। पर्व के दूसरे दिन ‘रम’ और ‘सेताम’ नाम से लोकनृत्य कर पूरा गांव उत्सव मनाता है। देवी-देवताओं की पूजा, गेड़ी नृत्य और पटाखों के साथ गांववासी एक-दूसरे को बधाई देते हैं
झाबुआ : ऊपर से गुजरती है गाय
दीपावली के अगले दिन झाबुआ और धार अंचल की रियासतकालीन ‘गाय गोहरी’ परंपरा खास है। इसमें मन्नत मांगने वालों के ऊपर से गाय गुजरती है, जिससे सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। यह परंपरा गोवर्धन पूजा से जुड़ी है। श्रद्धालु हवेली की परिक्रमा कर गाय को स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं।
राजस्थान, बाड़मेर : सीमा पर ऊंटों की दौड़ का आकर्षण
बाड़मेर जिले में बॉर्डर से सटे गांवों में दीपावली के दूसरे दिन सुबह ऊंट दौड़ की परंपरा है। इसे ‘ढाटी’ कहतेे हैं। आसपास के गांवों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है। विजेता का ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत किया जाता है। यह विभाजन से भी पुरानी परंपरा है, इसलिए सीमा के उस पार यानी पाकिस्तान में भी ऊंट दौड़ की ये परंपरा है।
सिरोही : दौड़ती गायों से वर्ष का अनुमान
सिरोही जिले में स्वरूपगंज के पास वासा गांव में गोवर्धन पूजा के दिन गायों की दौड़ से आगामी वर्ष का भविष्य देखा जाता है। शाम को मेले में ग्वाले गायों को गुड़ खिलाते हैं और कृष्ण उपदेश सुनाते हैं। इस दौड़ प्रतियोगिता में आगे रहने वाली गाय से आगामी साल के अच्छे या बुरे होने का अनुमान लगाते हैं। श्याम रंग की गाय आगे हो तो साल अच्छा और काले रंग की गाय आगे होने पर चिंताजनक माना जाता है।
बस्तर३ दिन दियारी
गोवा दीये नहीं, पुतले जलाते हैं
गोवा में दिवाली पर ‘नरकासुर’ के विशाल पुतले जलाते हैं। दक्षिण गोवा के पोंडा तालुक के नगुएशी गांव के आदित्य कनकोंकर ने बताया कि यह पुतले 20 मीटर तक ऊंचे होते हैं और इन्हें बनाने का ज्यादातर काम रात को किया जाता है। पुतलों को कई प्रतियोगिताओं में दर्शाया जाता है। विजेताओं को पुरस्कृत किया जाता है।
इंदौर हिंगोट युद्ध में युवाओं का जोश
श्रीलंका की दीपमालिका: लंका में दिवाली को दीपमालिका उत्सव के रूप में मनाया जाता है। यहां लोग मानते हैं कि यह दिन रावण वध के बाद भगवान राम की लंका वापसी का प्रतीक है।
मलेशिया की ‘हारी दिवाली’: मलेशिया में हारी दिवाली नाम से यह राष्ट्रीय पर्व है। भारतीय मूल के लोग पारंपरिक तेल के दीये जलाते हैं और मित्रों को मिठाइयां और व्यंजन परोसते हैं।
त्रिनिदाद: त्रिनिदाद और टोबैगो में हर साल ‘दिवाली नगर’ नामक जगह पर नौ दिन तक कार्यक्रम होते हैं। भारतीय नृत्य, संगीत, फैशन शो होते हैैं।
सिंगापुर: सिंगापुर में लिटिल इंडिया इलाका जगमगाता है। पारंपरिक दीयों की कतारें देखने लायक होती हैं। अन्य देशों में भी भारतीय दिवाली मनाते हैं।
बस्तर जिले में दिवाली को दियारी कहते हैं, जो 3 दिन मनाया जाता है। इसमें फसलों की शादी कराई जाती है। आदिवासी दिवाली पर फसलों को लक्ष्मी का प्रतीक मानकर भगवान विष्णु से शादी करवाते हैं। शादी के लिए पुजारी से तारीख ली जाती है।











