गोदना कला से आत्मनिर्भरता तक: राधा सिखा रही महिलाओं को बाजार से जुड़ने का हुनर

बस्तर अंचल की परंपरागत गोदना कला अब गांव की महिलाओं की आजीविका और आत्मनिर्भरता का मजबूत माध्यम बनती जा रही है। कोंडागांव जिले के केशकाल ब्लॉक के ईरा गांव की 23 वर्षीय राधा ने न केवल इस पारंपरिक कला को आधुनिक पहचान दिलाई है, बल्कि गांव की महिलाओं को जंगल और खेती से जुड़े उत्पादों की मार्केटिंग सिखाकर उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का काम भी शुरू किया है।
ओझा समुदाय से आने वाली राधा महज दसवीं तक पढ़ी हैं, लेकिन उनके आत्मविश्वास और नेतृत्व ने उन्हें पूरे इलाके में अलग पहचान दिलाई है। 19 साल की उम्र में गांव की सरपंच बनी राधा अब महिलाओं को रोजगार और बाजार से जोड़ने के मिशन में जुटी हैं। उन्होंने गांव की 20 महिलाओं का स्वसहायता समूह तैयार किया है, जो गोदना कला के साथ-साथ महुआ, तेंदूपत्ता, साल बीज और इमली जैसे वन उत्पादों को बेचने और उनकी सही कीमत प्राप्त करने की ट्रेनिंग ले रहा है।

महिलाएं मेहनत बहुत करती हैं
राधा कहती हैं कि आदिवासी महिलाएं मेहनत बहुत करती हैं, लेकिन उन्हें अपने उत्पादों की सही कीमत नहीं मिल पाती। इसी वजह से उन्होंने महिलाओं को केवल संग्रहण तक सीमित न रखकर बाजार की समझ देना शुरू किया। वे महिलाओं को सिखा रही हैं कि किस तरह महुआ, तेंदूपत्ता, साल और इमली को साफ-सुथरे तरीके से तैयार कर बेहतर दाम में बेचा जा सकता है, खरीदारों से सीधे संपर्क कैसे किया जाए और छोटे स्तर पर पैकेजिंग व मार्केटिंग कैसे की जाए।
वे कहती हैं, “महिलाएं खेती-किसानी के साथ जंगल से महुआ, तेंदूपत्ता और इमली भी लाती हैं। दिनभर कई तरह के काम करती हैं, लेकिन उनकी मेहनत का पूरा फायदा उन्हें नहीं मिल पाता। अगर महिलाओं को बाजार की समझ और आत्मविश्वास मिले तो वे परिवार की आर्थिक स्थिति बदल सकती हैं।”
गोदना कला को आधुनिक बाजार से जोड़ने की पहल
राधा ने गोदना कला को भी आधुनिक बाजार से जोड़ने की पहल की है। पहले पारंपरिक तरीके से बनाए जाने वाले गोदना की मांग कम हो रही थी, लेकिन अब आधुनिक डिजाइन और टैटू शैली के साथ इसे नई पहचान मिल रही है। राधा और उनकी टीम पारंपरिक आदिवासी आकृतियों को आधुनिक डिजाइन के साथ तैयार कर रही है, जिसे युवा वर्ग पसंद कर रहा है।
सरकार की ओर से मिले प्रशिक्षण और गोदना मशीनों ने भी इस काम को नई दिशा दी है। राधा बताती हैं कि मशीन से काम आसान हुआ है और युवाओं के बीच आकर्षण भी बढ़ा है। अब महिलाएं गांव से बाहर मेलों और स्थानीय बाजारों तक पहुंच बना रही हैं।
कम उम्र में शादी और तीन बच्चों की जिम्मेदारी संभालने के बावजूद राधा ने सीखना और आगे बढ़ना नहीं छोड़ा। वे शिक्षा को सबसे जरूरी मानती हैं। उनका कहना है कि पढ़ाई इंसान की सोच और समझ को विकसित करती है। यही वजह है कि वे गांव के हर बच्चे, खासकर लड़कियों की शिक्षा पर जोर देती हैं।
ईरा गांव की यह युवा महिला आज आदिवासी समाज की नई तस्वीर पेश कर रही है, जहां परंपरागत कला, जंगल से मिलने वाले उत्पाद और महिलाओं की मेहनत आधुनिक बाजार से जुड़कर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहे हैं।











