जो पहले कभी गिनती में नहीं थे, अब लोग इन्हीं से ले रहे सलाह

सरिता दुबे. विकलांगता के चलते जिन लोगों की न परिवार में गिनती होती थी, न ही समाज में उन्हें सम्मान मिलता था। इन हालात में अपना जीवन बसर कर रहे सैकड़ों विकलांगों को जब कुछ लोगों ने सहारा दिया तो न सिर्फ उनका जीवन बदला, बल्कि उनके जैसे कई लोगों का जीवन बदल गया।

कसडोल के रहने वाले डॉ. सुरेश और उनकी टीम के प्रयास से आज सैकड़ों विकलांगों को सोशल सिक्योरिटी के साथ-साथ रोजगार के साधन भी उपलब्ध हुए हैं। अब महासमुंद के आसपास के गांव के 11 हजार विकलांगों को उनकी टीम द्वारा सोशल सिक्योरिटी दिलवाई
गई है।

122 लोगों को रोजगार दिया : डॉ. सुरेश ने 122 विकलांगों को रोजगार दिया। साथ ही इन लोगों में आत्मविश्वास जगाया। अब यह सब लोग अवसाद से बाहर निकल कर सामान्य जीवन जी रहे हैं।

मोबाइल की लत छुड़वाई

इसी तरह डॉ. सुरेश ने सपेराबेड़ा के कई बच्चों को स्कूल से जोड़ा। साथ ही मोबाइल की लत से कई बच्चों को बाहर निकाला और सामान्य जीवन से जोड़ा। साल 2002 से सामाजिक कार्यों से जुड़े सुरेश ने बच्चों को शिक्षा से जोड़ा और अब विकलांगों को निराशा से बाहर निकाल कर उनमें आत्मविश्वास जगाया।

मिलने लगा सम्मान

झलप के लखनपुर गांव के 41 साल के बुधराव साहू कुछ समय से बहुत निराशा का जीवन जी रहे थे। वे परिवार और समाजवालों के लिए गिनती में भी नहीं थे। हमेशा तनाव में रहते थे। उनसे डॉ. सुरेश ने संपर्क किया और उन्हें इमली कैंडी बनाने की ट्रेनिंग दी। उन्हें बेचने का मंच दिया और साथ ही बुधराव को मुर्गीपालन के लिए सहयोग कराया। अब उन्हें बांस बनाने की ट्रेनिंग दे रहे है। इससे हुआ यह कि अब गांव के लोग उनसे सलाह लेने आते हैं। साथ ही उनकी पूछपरख भी होने लगी। इस तरह अब बुधराव ने अपने जैसे लोगों का एक ग्रुप बना लिया है जो एक-दूसरे की समस्या का समाधान करते हैं।

SARITA DUBEY

बीते 24 सालों से पत्रकारिता से जुड़ी है इस दौरान कई बडे अखबार में काम किया और अभी वर्तमान में पत्रिका समाचार पत्र रायपुर में अपनी सेवाए दे रही हैं। महिलाओं के मुद्दों पर लंबे समय से काम कर रही है।
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