भारत में पढ़ीं कार्की नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री

काठमांडू. नेपाल की पहली चीफ जस्टिस रहीं 73 वर्षीय सुशीला कार्की देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बन गई हैं। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने शुक्रवार को राष्ट्रपति भवन शीतल निवास में उन्हें शपथ दिलाई। शनिवार को मंत्रिमंडल विस्तार की संभावना है। आंदोलनकारी जेन-Z नेताओं ने सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि वे बाहर रहकर सरकार के कामकाज की निगरानी करेंगे। राष्ट्रपति पौडेल ने ऐलान किया कि छह माह के भीतर संसद का चुनाव करवाया जाएगा।
इससे पहले शुक्रवार को दिनभर अंतरिम प्रधानमंत्री के नामों पर गहमागहमी रही। देर शाम सेना, राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल और युवा नेताओं के बीच सहमति बनी। कार्की के सामने अब नेपाल को मौजूदा राजनीतिक संकट से बाहर निकालने की बड़ी चुनौती है। उनकी नियुक्ति को स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। उनके सत्ता संभालने से भारत और नेपाल के बीच संबंध और प्रगाढ़ होने की उम्मीद है।

9 सितंबर को सोशल मीडिया बैन करने, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ जेन-Z आंदोलनकारियों ने संसद, राष्ट्रपति भवन, सुप्रीम कोर्ट और पीएम केपी शर्मा ओली के आवास में आग लगा दी थी। उग्र प्रदर्शन के बाद कई पीएम ओली को पद छोड़ना पड़ा। हिंसा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 51 गई है। देश की जेलों को तोड़कर फरार हुए 13500 फरार कैदियों में कुछ को पकड़ लिया, जबकि 12,533 अभी फरार हैं।
73 वर्ष के ओली की जगह 73 वर्ष की कार्की
भ्रष्टाचार, भाई-भतीजवाद के खिलाफ जेन-जी के इस आंदोलन में युवा नेतृत्व की मांग भी उठी, लेकिन उम्र के लिहाज से स्थिति जस की तस रही। 73 वर्ष के केपी शर्मा ओली की जगह 73 वर्ष की ही कार्की को नेतृत्व सौंपना पड़ा। हालांकि गैर राजनीति छवि के कारण उन पर देश ने भरोसा किया है, लेकिन ‘युवा नेतृत्व’ की बात पूरी नहीं हुई।
ओली की पार्टी और माओवादियों का विरोध
पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी एनसीपी ने संसद भंग करने के फैसले का विरोध तेज कर दिया है। इधर माओवादी सेंटर संसद भंग करने और कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाए जाने के फैसले पर असहमति जताई है। पार्टी का कहना है कि संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत संसद को भंग किया गया है।
ये कारण, जिनकी वजह से चुनी गईं कार्की
स्वच्छ-निष्पक्ष छवि: जज रहते निष्पक्षता और ईमानदारी के कारण ख्याति अर्जित की। किसी बड़े दल से सीधा संबंध नहीं रहा, जिससे उन्हें सभी गुटों का भरोसा मिला।
भ्रष्टाचार विरोधी रुख: युवाओं के आंदोलन का मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार था। कार्की ने न्यायिक करियर में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। इसलिए युवाओं की पसंद।
संवैधानिक समझ: नेपाल के कानून और संविधान की गहरी समझ है। राजनीतिक उथल-पुथल के बीच ऐसे नेता की जरूरत थी, जो चुनाव कराने और स्थिरता लाने में सक्षम हो। इस कसौटी पर खरी उतरती हैं।
गैर राजनीतिक छवि: युवा ऐसा नेता चाह रहे थे, जो राजनीतिक दलों या गठबंधन से बाहर हो, निष्पक्ष और विश्वसनीय हो।
1समय कम, बड़ी जिम्मेदारी: छह माह के लिए अंतरिम पीएम चुनी गई हैं। इतने कम समय में भ्रष्टाचार व राजनीतिक अव्यवस्था को सुधारता कठिन काय है।
2 सेना-सरकार में संतुलन: सेना की ज्यादा सक्रियता लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। संतुलन साधना बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
3 बड़ी अपेक्षाएं: जनता को उनसे बड़ी उम्मीदे हैं। जिन पर खरा उतरना होगा। छह माह में निष्पक्ष चुनाव करवाना भी चुनौती।











